ढ़क्कन हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है| हमारे आस-पास मौजूद हर
डिब्बेनुमा चीज़ का अपना एक ढ़क्कन है| जो उस डिब्बे के अंदर रखी वस्तुओं को हमेशा बाह्य वातारण से
सुरक्षित रखती है और सड़ने से बचाती है| सोचो अगर ढ़क्कन जैसी चीज़ न बनी
होती तो हम कभी भी इत्र को भविष्य के लिए अपने पास सहेज कर नहीं रख सकते थे| पेन की निप को टूटने से कौन
बचाता? और सबसे बड़ी बात अगर शक्कर के
डिब्बे में ढ़क्कन नहीं होता तो सारी शक्कर चीटियाँ खा जाती और हम चाय के एक कप के
लिए तरसते फिरते!
हम
ढ़क्कन की उपयोगिता और आवश्यकता दोनों को नकार नहीं सकते हैं|
ढ़क्कन के बिना किसी डिब्बे की कल्पना ही नहीं की जा सकती है| सच तो यह हैं एक ढ़क्कन विहीन डिब्बे
का पूरा आस्तित्व ही दाँव पर लग जाता है क्योंकि उसमें रखा समान वातारण से
नमी सोखकर समान को खराब कर देता है| खुले डिब्बे में रखे समान पर अक्सर चूहे, बिल्ली, तिलचट्टे आदि हाथ साफ़ कर जाते
हैं जिससे उसकी विश्वसनीयता पर
प्रश्नचिन्ह लग जाता है| सिर्फ ढ़क्कन खो जाने की वज़ह से
उसे बड़ी बेरहमी से रसोईघर से निकाल
कर कचरे की पेटी में फेंक दिया जाता है| इसलिए ज़रुरी हो जाता है कि हर डिब्बा अपना ढ़क्कन
बहुत संभाल के रखे|
ये तो बात थी रोज़मर्रा में इस्तेमाल आने वाले डिब्बों के ढ़क्कन
की... पर कभी सोचा है कि हम भी एक डिब्बे की तरह हैं, हमको भी एक ढ़क्कन की ज़रूरत है!
जो हमें बाहरी दुनियाँ से सुरक्षित रखे| हमारी क़ाबिलियत को खराब होने से बचाए| विपरीत परिस्थितियों में हमें
टूटकर बिखने से बचाए| अक्सर लोग अपने ढ़क्कन को लेकर
संजीदा नहीं होते हैं, उन्हें लगता है उन्हें किसी
खास ढ़क्कन की ज़रूरत नहीं है, वो अपने पति/पत्नी, भाई/बहन या प्रेमी/प्रेमिका को अपना ढ़क्कन समझ
लेते हैं जबकि ऐसा नहीं है| बहुत सी परिस्थितियों में ये
सभी रिश्ते हमें अपने तरीके से न तो जीने देते हैं और न हमारे लिए सही निर्णय ले
पाते हैं क्योंकि इन रिश्तों में अक्सर परोक्ष अस्पष्ट स्वार्थ होता है|
हर इंसान को अपने ढ़क्कन की ज़रूरत होती है और यह ढ़क्कन कोई और
नहीं हमारा सबसे अच्छा मित्र होता है| हमारे लिए हमारे दोस्त से बेहतर ढ़क्कन कोई और
नहीं हो सकता| पर अपने दोस्त को अपना ढ़क्कन
बनाने से पहले हमें यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि क्या वो वाकई में हमारा ढ़क्कन बन
सकता है? क्योंकि किसी भी डिब्बे का
ढ़क्कन एक ही होता है और हर परिस्थिति में डिब्बे और ढ़क्कन को एक दूसरे का
साथ देना ही होता है| हमें ढ़क्कन बनने या बनाने से पहले से सोच लेना चाहिए कि ढ़क्कन का
डिब्बा, ढ़क्कन नहीं हो सकता क्योंकि आज तक किसी ढ़क्कन का
ढ़क्कन बना ही नहीं है| मुमकिन है कि ढ़क्कन का डिब्बा ही उस ढ़क्कन
का ढ़क्कन बन जाए पर ऐसे उदाहरण बहुत कम है|

ऐसा
दोस्त, दोस्त नहीं आपका ढ़क्कन होता है और मेरे पास एक
ऐसा मजबूत, टिकाऊ ढ़क्कन है... :)
shuraati paragraph kamaal ka hai...
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