like

Saturday, 22 September 2012

लव, सेक्स और धोखा




आज आधुनिक युग में प्रेम की परिभाषा बदल गई हैं| आज प्रेम का अर्थ शारीरिक सम्बन्धों से लगाया जाता हैं और बहुत हद तक यह सही भी हैं क्योंकि आज के अधिकांश लड़के और लड़कियों ने प्रेम की परिभाषा ही बदल कर रख दी है| उनके हिसाब से “प्रेम” जैसा कुछ होता ही नहीं और अगर प्रेम है तो वह सिर्फ पैसा हैं| अधिकतर लोगों का फलसफ़ा होता हैं प्रेम के नाम पर अपना काम निकालो और चलते बनो, चाहें सामने वाले की भावनाएं कितनी भी पवित्र और निर्मल क्यों न हो, वह लोग उनकी भावनाओं से खेलने में गुरेज नहीं करते हैं| उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाले पर क्या बीतेगा जब उसे उनकी असलियत का पता चलेगा| उन्हें इस बात का भी डर नहीं होता कि सामने वाले की नज़रों में वह गिर जाएगें|

आज नर हो या नारी सब आगे बढ़ना चाहते हैं इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जाते है| कई बार तो तरक्की पाने की खातिर वह अपने नैतिक मूल्यों के साथ साथ अपने शरीर को भी दाँव पर लगा देते हैं| सुप्रीमकोर्ट की महिला वकील हो या गीतिका शर्मा और बहुत से उदाहरण हैं जिन्होंने सिर्फ तरक्की के लिए अपने शरीर का सौदा कर लिया| वही दूसरी ओर पूनम पाण्डेय, शर्लिन चोपड़ा और राखी सावंत जैसे भी लोग हैं जो सस्ती प्रसिद्धि के लिए बीच सड़क पर अपने कपड़े उतारे से परहेज नहीं करते हैं| बहुत से तो ऐसे नाम हैं जिन्हें यहाँ लेना उचित नहीं है| बहुत सी महिलाएं अपनी तृप्ति और वासना की संतुष्टि के लिए नित नए जिस्म की तलाश में रहती हैं|

फिर एक और प्रश्न उठता है कि क्या सिर्फ औरतें ही अपने ज़िस्म को नंगा करने पर तुली हैं, पुरुष नहीं ?

जॉन आब्रहीम, सलमान खां को कौन भूल सकता है? अक्षय कुमार ने एक स्टेज शो के दौरान अपनी पत्नी से अपनी जींस का बटन बंद करवाया था, यह कौन भूल सकता है? सस्ती लोकप्रियता के लिए इतने बड़े मंच पर अश्लीलता से परिपूर्ण यह कदम निंदनीय है| वासना तृप्ति के लिए पुरुष, औरतों की तुलना में ज़्यादा साथी बदलते हैं|

इतिहास उठाकर देखेगें तो पुरुषों ने ही औरतों को बाज़ार में बेचा हैं, उन्हें देवदासी, नगर वधुएँ और वैश्या बनाने में उनकी ही मुख्य भूमिका थी| आज यह कह देना कि पुराने जमाने में औरतें मज़बूरी में वैश्या बनती थी पूर्णतयाः गलत हैं| पुरुष ने अपनी वासना तृप्ति के लिए औरत को देवदासी और नगर वधुएँ बनने पर मजबूर किया और उन्हें ही समाज से बाहर निकाल दिया| अपने ज़िस्म की भूख मिटाने के लिए उसने औरत को वैश्या बनाकर सड़क पर खड़ा कर दिया और स्वयं पवित्रता का चोला ओढ़े घूम रहा है|

कोई भी औरत वैश्या नहीं बनाना चाहती है चाहें वह आदिकाल हो या आधुनिक काल, पर जब पुरुष चंद सिक्कों और अपनी वासना के लिए नपुसंकता की हद पार करने पर उतारू हो तो औरत क्या करे? वैश्या या देवदासी बनी औरतों और उनके बच्चों के लिए अपने समाज में जगह है ही कहाँ? मज़बूरन उन्हें उसी क्षेत्र में रहना पड़ता है|

प्रेम के नाम पर हमेशा ही शोषण होता हैं और यह एक कटु सत्य है कि प्रेम के नाम पर शोषण पुरुष ही करता है जिसका ख़ामियाज़ा हमेशा औरतों को ही भुगतना पड़ता है| हाल ही में चंद्रमोहन की पत्नी फ़िज़ा उर्फ अनुराधा बाली के प्यार ने कितना बवाल मचाया| यह प्रेम नहीं था यह वासना थी और एक औरत का शोषण था| जाने माने फ़िल्म अभिनेता शत्रुध्न सिन्हा के रीना रॉय से प्रेम सम्बन्ध थे परन्तु उन्होंने रीना से शादी न करके पूनम से शादी की क्योंकि रीना रॉय एक बार डांसर थी और पूनम प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखती थी| कौन इसको प्रेम का नाम देना चाहेगा? कम से कम मैं तो इसे प्रेम का नाम नहीं दे सकती| 

वह प्रेम ही क्या जो समाज के सामने स्वीकारा न जा सके| वह साथी क्या जो अपने प्रेम को कलंकित और अपमानित होने से न बचा सके| वह प्रेमिका क्या जो अपने प्रेमी पर अपना सब कुछ न्यौछावर न कर दे और वह प्रेमी, प्रेमी नहीं जो मौत से पहले अपनी प्रेमिका का साथ छोड़ दे|

शायद प्रेम में वासना का मिलन आज नहीं बल्कि आदिकाल से चला आ रहा हैं, बस आज के युवा-युवतियों ने इस वासनायुक्त प्रेम से पर्दा उठा दिया है| जो कृत्य समाज में रात के अंधेरों और पर्दे के पीछे हो रहा था, उन्होंने उसे सबके सामने उजागर कर दिया है|

पहले की तरह आज भी प्रेम है पर उनके लिए जो निभाना जानते हैं, जिन्हें सिर्फ ज़िस्म दिखता है उनके लिये नहीं| मैं यह नही कहती कि प्रेम में ज़िस्म की चाहत नहीं होती, पर सच्चे प्रेम में झूठ नही होता, शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती, वासना नहीं होती| 

हमें प्रेम से नहीं वासना से बचना चाहिए| स्त्री हो या पुरुष, सबको अपनी देह के सौदे पर मिलने वाली तरक्की से बचना चाहिए| आधुनिकता के नाम पर नंगे होने से बेहतर है कि हम पूरे कपड़े पहनकर रूढ़ीवादी बने रहे क्योंकि अपनी मेहनत और ईमानदारी से कमाई गई शोहरत और पैसा लंबे समय तक रहता हैं जबकि ज़िस्म की हदों पर कमाई गई इज्ज़त जवानी के चार दिन जैसी होती है|

Friday, 14 September 2012

हाँ हिन्दी ही हैं हमारी मातृभाषा !!!



 भाषा, दोनों लोगों के बीच संवाद स्थापित करने का एक साधारण परन्तु सशक्त माध्यम है| भाषाज्ञान के अभाव में हम न तो किसी की भावनाएँ समझ सकते है और न अपने अतंर्मन की मनोस्थिति किसी को समझा सकते हैं| भाषा ही समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाती है| किसी देश या संस्कृति की उन्नति, वहाँ की भाषा पर निर्भर करती है, भाषा जितनी समृद्धिशाली और सशक्त होगी, देश उतना ही विकसित और उन्नत होगा|

यदि हमको अपनी मातृभाषा पर अधिकार नहीं है तो हम किसी और भाषा पर अपना अधिकार स्थापित नहीं कर पाएँगे क्योंकि दूसरों पर हम तभी विजय प्राप्त कर सकते हैं जब हमें अपने आप पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो| हम चाहें कितना भी पढ़-लिख जाएँ अगर हमें अपनी मातृभाषा नहीं आती तो हम अपनों से दूर हो जाएंगें| हम कितनी ही भाषाओं के ज्ञाता क्यों न हो परन्तु चिंतन-मनन हमेशा अपनी मातृभाषा में ही करते हैं और यहाँ तक कि हम अपना रोष भी अपनी ही भाषा में प्रकट करते हैं|

भारत में लगभग ६३ भाषाएँ मान्यता प्राप्त हैं और इसके अलावा न जाने कितनी और भाषाएँ और बोलियाँ हैं जो प्रचलन में हैं| देवनागिरी लिपि के साथ हिन्दी भाषा को १४ सितम्बर १९४९ को राजभाषा घोषित किया गया था| भारत में हिन्दी मुख्यतः उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान और बिहार के कुछ हिस्सों में बोली जाती है परन्तु अन्य जगहों पर हिन्दी के साथ साथ स्थानीय भाषा भी प्रमुखता से बोली जाती है| समय के साथ हिन्दी ने स्वयं को एक नई पहचान दी है| कुछ शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं ने हिन्दी भाषा को विश्व पलट पर खड़ा करने में बहुत मदद की है|

हिन्दी भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य कुछ इस प्रकार हैं -:
  •  विश्व में लगभग ५० करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं|
  • विश्व में ८० करोड़ लोग हिन्दी समझ सकते हैं|
  • अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद हिन्दी तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है|
  • ब्रिटेन में वेल्स के बाद हिन्दी भाषा का स्थान दूसरा है|
  • फिजी, मोरिशस, गुयाना, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, टाबैगो एवं संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दी अल्पसंख्यक भाषा है|
  • दुनिया के करीब ११५ शिक्षण संस्थानों में हिन्दी का अध्ययन होता है|
  • अमेरिका के ३२ संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जाती है|
  • ब्रिटेन की लंदन यूनिवर्सिटी, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी एवं यार्क यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढाई जाती है|
  • जर्मनी के १५ शिक्षण संस्थानों ने हिन्दी भाषा के अध्ययन को अपनाया है|
इसके अलावा बहुत से विदेशी साहित्यकारों ने हिन्दी भाषा में अपनी रचनाओं को कलमबद्ध किया है| जिनमें से किम यांग शिक (दक्षिण कोरियाई साहित्यकार), विक्टोरिया सेलेना (रूसी साहित्यकार), प्रोफ़ेसर विड हान (रामचरित मानस का चीनी भाषा में अनुवाद किया है)| प्रोफ़ेसर ओडोलीन सीमीचेल ने तो बहुत सी रचनाएँ हिन्दी में लिखी हैं, जिनमें से मेरे प्रीत तेरे गीत, स्वाती बूंद, नमो नमो भारतमाता प्रमुख रचनाएँ हैं|

आज विदेशों में हिन्दी अपना परचम लहरा रही है परन्तु भारत में हिन्दी भाषा को कोई सम्मान नहीं प्राप्त है, सिवाय इसके कि वह राष्ट्रभाषा है| भारत के सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थानों का कोई कार्य हिन्दी में नहीं होता है| यहाँ लोगों को हिन्दी बोलने में शर्म आती है| हिन्दी को अनपढ़ों और गवाँरों की भाषा समझा जाता है| भारत में अंग्रेजी अघोषित राजभाषा बन गई है| हिन्दी राजभाषा के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह कि स्नातक छात्रों तक को हिन्दी की वर्णमाला नहीं आती है| सिर्फ हिन्दी भाषा एक ऐसी भाषा है जो अन्य भाषाओं के शब्दों को बड़ी आसानी से अपने स्वरुप में समाहित कर लेती है| हिन्दी एक विस्तृत और विशाल भाषा है परन्तु इसमें कुछ संशोधन की आवश्यकता है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हिन्दी से दूर भागे या हिन्दी को अपनाने में शर्म करें|

सबसे बड़ी हास्यास्पद बात तो यह है कि सुबह से लोग एक दूसरे को “Happy Hindi Day” बोलकर हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ दे रहे हैं| वही दूसरी ओर १५ अगस्त और २६ जनवरी को भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, देश को राष्ट्रीय भाषा हिन्दी में सम्बोधित न करके अंग्रेजी में अपना भाषण सुनाते हैं और निर्लज्जतापूर्वक कहते हैं कि अंग्रेजी एक समृद्धिशाली भाषा है| कुछ शीर्षस्थ नेता तो यहाँ तक कहते हैं कि हिन्दी नौकरों की भाषा है| मैं यह नहीं कहती कि अंग्रेजी अशिष्ट भाषा है परन्तु देश के प्रतिनिधियों को राजभाषा के साथ ऐसा व्यवहार करना शोभा नहीं देता है|

भारत एक हिन्दीभाषी देश है परन्तु पूरे वर्ष हिन्दी भाषा की किसी को कोई चिंता नहीं होती लेकिन सितम्बर माह के प्रारंभ होते ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थान हिन्दी पखवाड़ा मनाने में जुट जाते हैं| जगह जगह पर सम्मेलन एवं संगोष्ठियाँ प्रारंभ हो जाती हैं| हिन्दी भाषा के साथ यह होना चाहिए, वह होना चाहिए या यह नहीं होना चाहिए... कुछ इस तरह के विषयों पर शिक्षाविद एवं कवि विचार करते नज़र आते हैं परन्तु हिन्दी पखवाड़ा बीतते ही सब लोग हिन्दी का चोला उतारकर खूंटी पर टांग देते हैं और अंग्रेजियत को गले से लगा कर धूमने लगते हैं| हिन्दी भाषा की स्थिति बिल्कुल उस ब्याही बेटी की तरह हो गई है, जिसको महत्वपूर्ण अवसर पर ही मायके बुलाया जाता है और अपने देश में हिन्दी दिवस मनाना तो बिल्कुल करवाचौथ के त्यौहार के जैसा है| पूरे साल पति को “बैकफुट” रखने वाली भारतीय पतिव्रता नारियाँ अचानक करवाचौथ को अपने “बैकफुटिए पति” को परमेश्वर बनाकर पूजती हैं और अगला दिन होते ही परमेश्वर पति फिर से बेचारे पति में बदल जाता है| हम भी अपनी राजभाषा के साथ बिल्कुल ऐसा ही कर रहे हैं| साल के ३६४ दिनों में हमें हिन्दी की याद नहीं आती लेकिन हिन्दी दिवस को अचानक उसे सजा-सवाँरकर कवि सम्मेलनों और सभागारों में मुज़रा कराने के लिए बैठा देते हैं| हमें समझना चाहिए  राजभाषा आखिर राजभाषा है, हमारे सम्मान और अस्तित्व का प्रतीक हैं| मैं मानती हूँ कि हम अपनी राजभाषा हिन्दी के लिए कुछ नहीं कर सकते पर कम से कम १४ नवम्बर को Happy Hindi Day मनाकर हिन्दी को अपमानित तो न करें|


Wednesday, 5 September 2012

तुम्हारा कोई एहसान नहीं


सलमान खान की फ़िल्म बॉडीगार्ड का एक डायलॉग “मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना” सबको याद होगा| यह डायलॉग स्वयं में कितना अतार्किक और विरोधाभाषी है| खुद ही कह रहा है कि मुझ पर कोई एहसान न करके एक एहसान कर दो| जब से यह डायलॉग मार्केट में आया है कई लोगों ने इसे अपने जीवन का सूत्र बना लिया है| जब कोई दूसरा व्यक्ति उन लोगों की मदद करता है तो वह लोग मदद करने वाले के मुँह पर यह डायलॉग उठाकर मारते नज़र आते हैं और खुद को सम्पूर्ण आत्मनिर्भर बताते हैं पर वह लोग भूल जाते हैं कि वास्तविक जीवन और रजत पटल पर चित्रित जीवन में बहुत अंतर होता है|

कुछ लोग हमेशा यह दिखाना चाहते है कि उनके जीवन पर किसी का कोई एहसान नही है| उन्होंने सब कुछ अपने दम पर हासिल किया है और आगे अपने दम पर ही हासिल करेगें| उनकी उन्नति-अवनति, जीत-हार में किसी का कोई हाथ नहीं है| वह लोग किसी से मदद नहीं लेते| अपने काम के लिए किसी से सिफ़ारिश नहीं करते पर  वास्तविक जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है ही नहीं जिसने कभी किसी का एहसान न लिया हो और किसी पर कोई एहसान किया न हो| यह लोगों का भ्रम है कि वह सम्पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हैं| उनके जीवन पर किसी का कोई उपकार नहीं है|

शायद लोग यह भूल जाते हैं कि हमारे जन्म पर हमारे माता पिता का एहसान होता है| माँ अपने गर्भ में हमें  आश्रय देकर जीवन को सुरक्षित करती है| माँ बिना किसी गिले-शिकवे के मल-मूत्र साफ़ करती है, हमें स्तनपान कराती है| एक पिता जीवन जीने के लिए हमारा धरातल तैयार करता है जिस पर खड़े होकर हम दंभ भरते हैं कि हमने अपने जीवन में कभी किसी का कोई एहसान नहीं लिया| हमारा शिक्षक, जो हमें जीवन का पाठ पढाता है| हमें अच्छे बुरे में अंतर करना सिखाता है| हम उसके सामने छाती चौड़ी करके बोलते हैं कि हमने सब अपने आप सीखा है और न जाने कितने रिश्ते हैं जो हमारे जीवन के संघर्ष में हर पल हमारे साथ खड़े रहते हैं पर वक्त बीत जाने पर हम उनके उपकारों को नकार देते हैं|

माँ-बाप से बढ़कर भी कोई है जो हमारे जीवन पर सबसे बड़ा एहसान करता है| उसके एहसान के ने बिना हम शायद जिन्दा ही नहीं रह सकते| वह और कोई नहीं हमारे चारों ओर की मनभावन प्रकृति है| हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रकृति, हम पर हर पल एहसान करती है| एक बार हमारे माता-पिता, हमारा शिक्षक हमें यह एहसास दिला सकते है कि उन्होंने हम पर एहसान किया है पर प्रकृति कभी भी हम पर अपना एहसान नहीं जताती है| हवा, पानी, सूर्य-चंद्रमा, यह धरती और न जाने कितनी ही प्राकृतिक चीज़ें हैं जो हम पर पल-पल एहसान करती हैं|

मनुष्य हो या जानवर सब कहीं न कहीं किसी के साथ ईर्ष्या, भेदभाव रखता है पर प्रकृति किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करती है| शायद ईश्वर ने प्रकृति को बुद्धि नहीं दी इसलिए वह हर पल निष्पक्ष रहती है| अगर हम जमीन में एक अच्छा बीज बोते हैं तो धरती हमें उस एक अच्छे बीज के बदले में कुंतल भर अच्छा अनाज देती है| लेकिन सड़ी-गली बीज बोने पर वह हमें सड़ा हुआ अनाज वापस नहीं करती| वह बिना शिकायत किए सड़ा हुआ बीज अपने अंदर समाहित करके खाद बनाती है और हमें पुन: अच्छी गुणवत्ता का अनाज देती है| मतलब हम जमीन में चाहें जैसा बीज बोएं वह हमें हमेशा अच्छा ही वापस करती है| पर हम ऐसे नहीं हैं... अगर हमसे कोई अच्छी बात करता है तो हम उससे कुछ नहीं कहते लेकिन जब कोई हमसे बुरी बात कहता है तो हम उसे झाड़ झाड़ दर्जन भर गालियाँ सुना देते हैं|

हम प्रकृति में उपलब्ध पानी को चाहें कितना भी गंदा क्यों न कर दें पर बरसात में प्रकृति हमें स्वच्छ पानी ही देती है| साँस द्वारा हम प्रकृति की स्वच्छ वायु को ग्रहण करते है और प्रकृति को अशुद्ध दूषित वायु वापस करते हैं, फिर भी प्रकृति हमसे कभी नहीं कहती कि हम उसकी वायु को साफ़ स्वच्छ करें| वह स्वयं अपने पेड़-पौधे रूपी सेवकों से हवा को निर्मल करवाती रहती है और हमें बिना शिकायत किए फिर से वापस देती रहती है| हमें प्रकृति से सीखना चाहिए कि कैसे लोगों पर एहसान करके भूल जाना  चाहिए परन्तु मनुष्यों के साथ ऐसा नहीं होता है, प्राय: जब वह उपकार करता है तब तो वह निस्वार्थ करता है परन्तु समय समय पर वह लोगों को अपने द्वारा किए गए उपकार को गिनाने ने नहीं चूकता है|

माना की मदद करने वाले अधिकतर लोग मदद करने के बाद अपने किए एहसानों को भूल जाते हैं पर हमें कभी भी उन एहसानों को नहीं भूलना चाहिए| हमें कभी भी उन व्यक्तियों का अपमान नहीं करना चाहिए, जिन्होंने हमें हमारे संघर्ष के दिनों में सहायता प्रदान की हो|

हमें स्वयं में और जानवरों में कुछ तो अंतर रखना ही चाहिए| जानवर अपने अविवेकी स्वभाव के चलते उसे ही सींग मारते हैं जो उसे भोजन देता है| जानवर कभी किसी का एहसान मानते हैं परन्तु इसका किसी को कोई अफ़सोस नहीं होता| अफ़सोस तो तब होता है जब विवेकी मनुष्य किसी का एहसानमंद होने की बज़ाय एहसानफ़रामोशी की सारी हदें पार करने लगता है| जब वह अपने बूढ़े माता-पिता की रोटियों की गिनती करता है| दुःख तो तब होता है जब वह प्रकृति का बराबर दोहन करने के बाद घमंड से कहता कि आज तक उसने किसी का एहसान नहीं लिया|

मेरी नज़र में किसी से एहसान लेना बुरी बात नहीं है, चाहें वह एहसान प्रकृति का हो या किसी व्यक्ति विशेष का; बस हमें एहसानफ़रामोश होने की बज़ाय हमेशा लोगों का एहसानमंद होना चाहिए| हमें अपनी उपलब्धि पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि पृथ्वी पर बिना सहभाहिता के जीवन संभव ही नहीं है|


Wednesday, 22 August 2012

Keep Distance


“keep distance” या “एक निश्चित दूरी बनाएं रखें”, हम यह जुमला सड़क पर दौड़ते वाहनों के पीछे लिखा देखते हैं| शायद ही कोई ऐसा वाहन होगा जिसके पीछे यह न लिखा हो| हम इस जुमले के साथ साथ कुछ और जुमले मसलन “जगह मिलने पर पास दिया जाएगा”, “bolw horn” और “use dipper at night” हर वाहन के पीछे लिखा देखते हैं और दिन में कई बार पढकर आगे बढ़ जाते हैं| असल में यह सब जुमले नहीं बल्कि यातायात के नियम हैं, जो हर वाहन के पीछे इसलिए लिखे होते है कि हम वाहन चलाते समय कोई नियम भूले नहीं| जब भी हम कोई वाहन चलाते हैं, हमें हमेशा इन नियमों का ध्यान रखना होता है| अगर हम कभी इन नियमों की अनदेखी करते हैं तो हम किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या कोई दूसरा हमारी ग़लती का शिकार हो जाता है| कभी कभी इन नियमों की अनदेखी करना जीवन पर भारी पड़ जाता है| यातायात के यह सारे नियम इसलिए बनाए जाते है जिससे सड़क पर दौड़ता जीवन सुगम और सुरक्षित रहे| कोई हताहत या चोटिल न हो|

आज इन यातायात के नियमों को सड़क पर लागू न करके अपने जीवन पर लागू करते है और देखतें है कि इन नियमों का हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है|
सबसे पहले बात करते हैं “keep distance” की, मतलब एक निश्चित दूरी बनाए रखें; पर सवाल उठता है कि किससे निश्चित दूरी बनाकर रखें और क्यों? तो इस सवाल का सीधा-सा उत्तर है, हमें हमारे जीवन में पहले से मौजूद या भविष्य में आने वाले रिश्तों से हमेशा एक दूरी बनाकर रखनी चाहिए| क्योंकि बहुत ज़्यादा नज़दीकिया अक्सर कड़ुवाहट को जन्म दे देती है| कभी-कभी स्नेह के कारण हम अपने रिश्तेदारों, मित्रों के इतने करीब हो जाते हैं कि वह हमारा फ़ायदा उठा लेते हैं| प्रेम और विश्वास के चलते हम उनकों अपने राज़, अपने जीवन की कड़वी सच्चाई बता देते हैं, क्योंकि हम उनको अपना विश्वासपात्र समझते है जबकि सच्चाई इसके एकदम उलट होती है| अवसर आने पर वो लोग हमारे राज़ सबके सामने खोलने से हिचकते तक नहीं हैं और कभी कभी तो हमको ही डराते-धमकाते रहते हैं और हम उनकी हर सही-ग़लत बात को मानने के लिए मज़बूर होते है| 

अब मन में एक और प्रश्न उठता है कि क्या सभी रिश्ते ऐसे ही होते हैं? जहाँ तक मेरा मानना है तो लगभग सभी रिश्ते ऐसे ही होते है| क्योंकि हमारे साथ विश्वासघात हमारा विश्वासपात्र ही करता है| इतिहास उठाकर देखगें तो बहुत से उदाहरण मिल जाएगें कि कैसे विश्वासपात्रों ने अपने मित्रों, मालिकों और रिश्तेदारों के साथ विश्वासघात किया| जीवन जीने के लिए लोगों पर विश्वास करना आवश्यक है पर किसी के ऊपर अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए| अगर हम किसी के ऊपर अन्धविश्वास करते हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि सामने वाला कुछ भी करे पर हमने अपनी आँखें बंद कर ली हैं| वह कुछ भी करे हमें उसका विरोध नहीं करते क्योंकि हम मानने लगते है कि सामने वाला हरदम सही ही है| अक्सर हम जिसके बारे में यह धारणा बना लेते हैं कि वह कभी ग़लत नहीं हो सकता; वही व्यक्ति हमें कदम कदम पर ग़लत साबित करता है और एक वक़्त ऐसा आता है कि हम सब कुछ अपने अन्धविश्वास के चलते हार जाते हैं|

जब हमारा राज़दार ही हमारा राज़ सबके सामने खोल देता है तो हमें बहुत आश्चर्य होता है| हमें उसकी गद्दारी पर यकीन नहीं होता है पर ग़लती सामनेवाले की नहीं, हमारी होती है| जब हम खुद अपना राज़ अपने तक सीमित नहीं रख पाए तो हमारा मित्र या रिश्तेदार उस राज़ को राज बनाकर क्यों रखेगा? हम अक्सर लोगों को अपना राज़दार उस समय बनाते है जब हम बहुत खुश होते है या बहुत दुखी होते हैं| इन स्थितियों में हम अपना विवेक खो बैठते है और सब कुछ लोगों को बता जाते हैं| इसलिए इन विकट परिस्थितियों में हमें हमेशा अपने दिमाग़ की लाल बत्ती जला कर रखनी चाहिए| लाल बत्ती बोले तो “use dipper at night”... जैसे रात में चलते वाहन हमेशा लाल बत्ती जलाकर रखते हैं, हमें भी हमेशा सतर्क रहना चाहिए| कभी भी अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि खुली किताब जल्दी पीली पड़ती और फटती है| लेकिन इसका यह अभिप्राय भी नहीं है कि हम ज़िन्दगी की किताब को बंद अलमारी में दीमकों को चाटने के लिए छोड़ दें| किसी को कुछ बताने से पहले हमेशा यह सोच लेना चाहिए कि हमारे द्वारा दी गई जानकारी से भविष्य में हमें तो कोई परेशानी तो नहीं होगी|

अब बात आती है “blow horn” की, इस नियम का प्रयोग जितना सड़कों पर वाहन दौड़ाते हुए किया जाता है उसका १ प्रतिशत भी हम अपनी ज़िन्दगी में नहीं करते हैं| अक्सर देखा जाता है कि हमारे आस-पास के लोग ही हमें बार-बार चोट पहुँचाते हैं| हमारा और हमारी भावनाओं का मजाक उठाकर हमें आहत करते पर हम उनसे चाहकर भी कभी कुछ कह नहीं पाते क्योंकि वह सब लोग हमारे अपने होते है| हम उनसे संबंध खराब नहीं करना चाहते और सोचते रहते हैं कि सब अपने आप ठीक हो जाएगा पर ऐसा नहीं होता| इन स्थितियों में घुट-घुट कर जीने से बेहतर है कि हम सामने वाले को साफ़ लफ़्ज़ों में समझा दें कि दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए| किसी को किसी के मान-सम्मान को आहत करने का कोई हक़ नहीं है| हम सबको यह समझना चाहिए कि अपनी स्वंतत्रता वहाँ समाप्त हो जाती है जहां से किसी दूसरे की नाक शुरू होती है| जैसे समय पर बजाया गया हार्न एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो रोक लेता है ठीक वैसे ही समय रहते लोगों को अपना नज़रिए और अपने प्रति उनका व्यवहार कैसा हो,  अच्छी तरफ़ समझा देना चाहिए| पर कई बार ऐसा होता है कि लोगों को बार बार समझाने और बताने पर भी उनको बात समझ में नहीं आती है| बार-बार वो हमारे साथ वैसा व्यवहार करते रहते हैं जिसके लिए हम उन्हें मना कर चुके होते है और तो और जब हम उन्हें टोकते है तो वो माफ़ी मांग लेते है और आइंदा ऐसा न करने का वादा करते है पर चिकने घड़े पर पानी कितनी देर टिकता है, यह तो सभी जानते हैं|

माना रिश्ते बनाने में वर्षों लग जाते हैं पर बार-बार समझाने पर भी जब कोई कुछ समझना ही नहीं चाहता तो हम क्यों हर बार किसी की बातों से अपने मन को आहत करें| हम किसी को खुश करने तथा उसके साथ रहने के लिए क्यों अपने आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाएं? क्यों घुट-घुट कर जिएँ? हमें समय रहते इन रिश्तों से दूरियाँ बना लेनी चाहिए| दुनियाँ क्या कहेगी? समाज में हमारी बे-इज्जती हो जाएगी... इन बातों को हमें दरकिनार कर देना चाहिए| हमें ज़िन्दगी खुश रहकर जीने के लिए मिली है न कि घुट-घुटकर मरने के लिए| शायद इसीलिये हर वाहन के पीछे लिखा होता है, “जगह मिलने पर पास दिया जाएगा”| रिश्ते टूटने पर दुःख और तकलीफ़ें तो ज़रूर होती हैं पर कुछ समय बाद सब पहले जैसा सामान्य और सुंदर हो जाता है|

वैसे तो यह सारे नियम यातायात को सुगम और सरल बनाने के लिए बनाए गए हैं पर हम इन नियमों के प्रयोग से अपने जीवन के यातायात को भी सरल बना सकते है| बस ज़रूरत है तो इन नियमों को अपने जीवन में कड़ाई से लागू करने की और यह पहचानने की कि कौन सा नियम कहाँ और कब लागू करना है|


Friday, 10 August 2012

वो कबूतर का बच्चा!


­जब मन में अनहोनी की आशंका होती है और वह घटित हो जाती है, तो हृदय दुःख और विषाद से भर जाता है| कल रात जब मैं सोने जा रही थी मुझे यकीन था कि सुबह उठकर मुझे शतप्रतिशत दुखद समाचार से दो चार होना पडेगा और वैसा हुआ भी! आज सुबह उठकर जैसे ही आशंकित मन के साथ; मैं अपने आंगन में पहुँची, मेरी माँ ने मुझे वह दुखद समाचार सुना दिया... मैं समाचार सुनकर सिर्फ इतना ही बोल पाई “मुझे तो पता था यहीं होगा”| मेरा हृदय दुःख से भरता जा रहा था, मन मायूस हो गया| मेरी नज़रे उस छोटे-से कबूतर के बच्चे को लगातार ढूंढ रही थी और दुआ कर रही थी, काश! वह वापस आ जाए| हमने दो बार उसे बचाया था पर आज शायद उसकी किस्मत अपना खेल दिखा गई थी| आंगन में बस उस छोटे-से कबूतर की माँ बार-बार गूंटर गूं गूंटर गूं करके इधर-उधर उड़कर अपने बच्चे को ढूंढ रही थी| कभी आंगन की मुंडेरों पर बैठकर अपने बच्चे को पुकारी तो कभी रोशनदान पर अपना बार-बार सिर पटकती| उसकी आवाज में इतनी वेदना थी कि मेरा हृदय फटा जा रहा था| मैं अभी किसी की माँ नहीं हूँ फिर भी आज मेरा ह्रदय उस कबूतर के बच्चे के लिए तड़प रहा था| मुझे लग रहा था जैसे मेरा बच्चा मुझसे दूर हो गया है| मैं सिर्फ यही सोच रही थी उस माँ की हालत क्या हो रही होगी; जिसने इसे जन्म दिया, सेया है, रोज़ उसके लिए दाना लाती है|

बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया था, उसे उड़ना सीखे हुए दो-चार दिन ही हुए थे; इसलिए मेरे आंगन में बने अपने घोंसले से निकल कर मुंडेरों पर चीं चीं करते हुए फुदकता उड़ता फिरता था| उसकी उड़ान सीमा महज़ पन्द्रह फुट से ज़्यादा नहीं थी इसलिए सिर्फ आँगन, बरामदे में ही घूमता रहता था और अगर थोड़ा जोश में आ गया तो छत की मुंडेर के एक-आध चक्कर काट कर फिर नीचे आ जाता था| उस नन्हें-से बच्चे के सिर्फ दो ही काम थे; एक तो इधर उधर उड़ना और दूसरा पूरे आंगन में बीट करना| उसकी बीट से पूरा आंगन और आंगन में रक्खा सारा समान गंदा हो रहा था पर हमको कोई आपत्ति नहीं थी | हम उनपर ध्यान भी नहीं देते कि वह और उसकी माँ क्या कर रहे है? लेकिन आज जब बच्चा हमारी नज़रों के सामने नहीं था तो हम सब सिर्फ उसकी ही बातें कर रहे थे; सारा दिमाग उस बच्चे पर टिक-सा गया था| उसकी माँ की तड़प और दर्द, हमारी रही-सही वेदना को खरोंच-सी रही थी| उसकी माँ के साथ-साथ हम भी उस नन्हें से बच्चे के लिए विकल हो रहे थे| मानों ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना हमारे सीने में बिछोह का खंज़र घोंप कर हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गया है और हम सीने में दर्द लिए जीवित रहने के लिए मज़बूर हैं|

उस माँ की हालत हम समझ रहे थे जो हमेशा के लिए अपने नन्हें-से बच्चे से बिछड़ गई थी और इस बिछोह का ज़िम्मेदार कोई और नहीं मेरा भाई था| मुझे रह-रह कर अपने भाई पर गुस्सा आ रहा था; उसको क्या जरूरत थी; रात में उस नन्हें-से बच्चे को मुंडेर से उड़ाने की? उसने अपनी बीट से सिर्फ आंगन ही तो गंदा किया था, वह पानी से धोकर साफ़ कर लिया जाता| दो दिन पहले, पापा उसे मारने जा रहे थे क्योंकि वह बार बार उड़कर रसोईघर में घुसने की कोशिश रह रहा था तब नानी अम्मा और मैनें मना किया| परसों भाई को परेशान कर दिया तो वह मारने जा रहा था; तब माँ ने उसे रोक लिया और कहा “जाने दो, बेचारा बेजुबां पक्षी ही तो है, क्यों मारोगे उसे” पर कल रात को उसने पूरा आंगन अपनी बीट से गंदा कर दिया तो भाई ने उसे मारने की बजाय उड़ा दिया| भाई ने उसे मारने की बजाय उडाकर, काम तो अच्छा किया था पर वो नन्हा-सा बच्चा उड़कर अपने घोंसले में जाने की बजाय ऊपर छत की ओर उड़ गया|

जैसे ही उसके उड़ने की फड़फाड़ाहट की आवाज़ माँ और नानी अम्मा के कानों में पड़ी; वे दोनों भाई से नाराज़ हुई “क्यों रात में उसे उड़ा दिया? अब उसे कोई बिल्ली नोंच डालेगी! अब वह जिंदा नही बचेगा”, मुझे भी भाई की इस हरकत पर गुस्सा आया| हमारी छत पर अक्सर बिल्लियाँ आती हैं जो पक्षियों के छोटे छोटे बच्चों पर झपटकर अपना शिकार बनाती हैं| इसी बात से हम सब आशंकित और दुखी थे कि वह कबूतर का बच्चा भी किसी बिल्ली का आहार बन जाएगा| हम सबको दुःख तो था लेकिन वह हमारा बच्चा नहीं था इसलिए हम उसे ढूँढने भी नहीं गए | बस हम सब दुआ कर रहे थे कि वह नन्हा-सा बच्चा बच जाए| रात गहराती गई और हम सो गए| लेकिन जब सुबह उठकर कबूतर के बच्चे को आंगन में नहीं पाया तब हमें लग रहा था कि जैसे कोई अपना हमसे दूर चला गया है| हमें उसके जीवित बचने पर शक तो रात से था, लेकिन सुबह शक और गहरा हो गया जब बच्चे को आंगन में नहीं पाया; उसपर उस बच्चे की माँ का विलाप, हमें यकीन दिलाने के लिए काफ़ी था| हम दुःख और संताप से भर गए थे| कबूतरी परेशान-सी आंगन का कोना कोना छान रही थी और जब बच्चा आंगन में नहीं मिला तो उसकी तलाश में वह छत पर उड़ गई| यह घटनाक्रम करीब दो घंटे चलता रहा और हम बेबस मूकदर्शक बने देखते और दुखी होते रहे|

अचानक दीदी चिल्लाई “देखो! बच्चा!!!” यह क्या! अचानक से कबूतरी अपने बच्चे को कहीं से ढूंढ लाई! पर कहाँ से? शायद रात में डरकर बच्चा कहीं छुपकर बैठ गया होगा, जब सुबह अपनी माँ की करुण पुकार सुनी तो बाहर आ गया होगा| बच्चे को देखकर हमारा दुःख जाता रहा, हम खुशी से झूम उठे| हमारे होठों पर एक मील लम्बी मुस्कान थी, हृदय आनंद से भरा हुआ था|
दीदी फिर से बोली “आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान किसी को दुःख नहीं दे सकते”, शायद यह बात सत्य भी है| कबूतर का बच्चा और उसकी माँ बहुत खुश है, वह दोनों सुबह से साथ साथ हैं| शायद भाई की कल वाली हरकत से वह दोनों इतना भयभीत है कि वह छत की मुंडेर से नीचे आंगन में नहीं आए हैं|

अब मैं सिर्फ इतना ही सोच रही हूँ कि जो दर्द और दुःख हमें हो रहा था, भाई को क्यों नहीं हुआ? पापा को उस बच्चे से ममता क्यों नहीं हुई? उसकी बीट हम औरतों को ही दिनभर साफ करनी पड़ती है फिर भी हमें उस पर गुस्सा नहीं आया| क्या सच में पुरुष के सीने में ममता और प्रेम नहीं होता? क्या ईश्वर ने उसकी प्रकृति निष्ठुर ही बनाई है? उस बच्चे को अगर कोई बिल्ली खा जाती तब पापा और भाई को संताप होता? क्या वे दोनों उसकी मौत को आसानी से भुला देते? बहुत से सवाल मेरे मन में उठ रहे है, जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है|
पर आज मैं और घर की सभी औरतें खुश हैं कि कबूतर का छोटा-सा बच्चा जीवित है| हम यही कामना करते हैं कि वह बच्चा चिरंजीवी हो|

श्रीकृष्ण प्रेम के देव है, विश्व में व्याप्त सम्पूर्ण प्रेम का केन्द्र श्रीकृष्ण ही हैं| इसलिए आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ, “हे नाथ! थोड़ा सा प्रेम और ममत्व का संचरण पुरुष हृदय में भी करें”|


Wednesday, 1 August 2012

अतीत

गूगल से साभार 
अतीत, जीवन का वह पल है जिसको हम भविष्य का साथ पाने के लिए, अपने वर्तमान के पीछे छोड़ आए हैं| जो आज अभी है, वो दिन ढलने के बाद अतीत बन जाता है| अतीत की स्मृतियों के चिन्ह सदैव हमारे साथ रहते हैं|  हमारा अतीत ही हमें हमारे होने का एहसास करता है| न चाहते हुए भी हम हमेशा अपने अतीत से जुड़े रहते है क्योंकि हमारा अतीत हमारे अस्तित्व का एक साक्ष्य है| अतीत हमारे जीवन का एक हिस्सा है, जिसे न तो फिर से बनाया जा सकता है और न कभी पूर्णतयाः मिटाया जा सकता है| अक्सर जब भी अतीत का प्रसंग आता है; हम सबको अपने अतीत में की गई गलती या दुखद घटनाएं ही याद आती हैं क्योंकि हमारे द्वारा की गई गलती, हमेशा हमारी अंतरात्मा को कचोटती रहती है| ऐसा नहीं है कि अतीत कभी सुन्दर नहीं हो सकता परन्तु सुखद यादें समय के साथ धूमिल हो जाती है, जिसे हम आसानी से भूल जाते है और इसीलिये अतीत हमें कटु एवं कष्टकारी लगता है|


हम अपने अतीत से बचने के लिए हर संभव कोशिश करते है; कभी किसी का सहारा लेते तो कभी खुद को कमरे में बंद करके अतीत से भागते  हैं| लाख दरवाजे बंद कर लेने बावज़ूद अतीत हम पर हमेशा हावी रहने की कोशिश में रहता है; अपनी तरफ़ मज़बूती से खींचता है| अतीत पर चाहें जितने भी पहरे लगाओ, वह पल भर में बंधन मुक्त होकर हमारे सामने मुंह उठाकर खड़ा हो जाता है और हम कुछ नहीं कर पाते हैं| अतीत बेरहम होता है, सबके सामने हमारी इज्ज़त तार तार करने की हर बार धमकी देता है| हमें डरा कर अपने बाहुपाश में बांधे रखता है|


समय के साथ परिवेश बदल जाते हैं, रिश्ते बदल जाते हैं, आबोहवा बदल जाती है, यहाँ तक कि लोगों की पहचान बदल जाती है पर अतीत कभी नहीं बदलता| हमारी लाख कोशिशों के बावजूद भी हम अपने अतीत के भयानक चंगुल से नहीं बच पाते हैं| हमारे मरने के बाद भी अतीत कभी भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता है, वह स्वयं जीवित रहता और हमें भी जीवित रखता है| अतीत, हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों ही निगल जाने के लिए आतुर रहता है| हमें बर्बाद करने का रोज़ एक नया पैतरा ढूढ़ता रहता है और अक्सर हमें बर्बाद कर भी देता है|


पर ऐसा नहीं है कि हम इस अतीत नामक दानव पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं; क्योंकि इस मृत्युलोक में सबका का अंत निश्चित है| सत्य को स्वीकार करने की क्षमता ही मात्र एक ऐसा अस्त्र है, जिससे अतीत को भी मारा जा सकता है| सत्य को स्वीकार करके हम अपने दुखद अतीत के सम्पूर्ण साम्राज्य का अंत कर सकते हैं|  यदि हमें अपना वर्तमान और भविष्य दोनों सुंदरतम एवं शांतिपूर्ण चाहिए तो अतीत का सत्य कितना भी कटु क्यों न हो; हमें दृढ़ता एवं विनम्रता के साथ उसे स्वीकार कर लेना चहिये; क्योंकि अतीत एक सत्य है और सत्य को न तो हराया जा सकता है और न कभी छुपाया जा सकता है|


यदि समय रहते गलती को सुधारा न जाए तो यही गलती भविष्य में अतीत का विकराल रूप लेकर हमारे सामने आती है और हमारे मान सम्मान को तार तार कर देती है; हमारी प्रतिष्ठा पर गहरा आघात करती है|  गलती करना मनुष्य का स्वभाव है, अक्सर बाल्यावस्था में की गई गलतियाँ क्षम्य होती हैं क्योंकि बचपन विवेकरहित एवं बोधराहित होता है| परन्तु युवावस्था में की गई गलतियों की सजा हमें वृद्धावस्था में ब्याज सहित चुकानी पड़ती हैं|


जैसा कि आजकल देश के एक वरिष्ठ नेता जी के साथ हो रहा है| नेता जी के पलभर छलावे सुख की लालसा ने उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई इज्ज़त को सरेआम नीलम कर दिया| उनके अतीत से वह जितने शर्मसार हुए हैं, उससे कहीं ज्यादा उनका परिवार शर्म झेल रहा है| हम नेता जी को अविवेकी नहीं कह सकते क्योंकि वह  देश और समाज से जुड़े निर्णय ले रहे हैं| अगर उन्होंने जोश में अपने होश न होए होते तो शायद आज उनकी समाज में इतनी किरकिरी न हो रही होती| इस कृत्य में नेता जी और उनकी सहभागी दोनों की ही बराबर के ज़िम्मेदार हैं परन्तु बेइज्जती सिर्फ नेता जी की हुई क्योंकि नेता जी सच्चाई को सिरे से नकार रहे थे|
गर नेता जी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली होती तो शायद उनके अतीत ने उनके वर्तमान को पानी-पानी न किया होता|


अतीत, संदूक में बंद लाश के समान है जिस पर चाहें जितना भी चन्दन का इत्र लगाओ, खुलने पर सड़ांध आती ही है| 

Friday, 27 July 2012

रियल हीरोज़


कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे वीर जवान  

पिछले सप्ताह सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर एक ही खबर छाई थी और सभी लोग उस खबर को देखने, सुनने और पढ़ने में व्यस्त थे| यह बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना की मृत्यु की खबर थी, जिससे पूरे देश में एक शोक की लहर दौड़ गई| सभी अपने अंदाज में राजेश खन्ना साहब को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे| सोशल नेटवर्किंग साइट्स ट्वीटर और फेसबुक पर तो लोग अपनों की मृत्यु से ज्यादा दुखी और ग़मज़दा दिखे|
रेडियो चैनल भी पूरी तन्मयता के साथ राजेश साहब से जुड़े हर छूए-अनछुए पहलूओं को देश की आम जनता के बीच बिना किसी अवरोध के प्रसारित करने में जुटा था| पूरे दिन टीवी और रेडियो में उनकी ही फिल्मों के गीत बजते रहे और दूसरे दिन हर टीवी चैनल ने बिना किसी कॉमर्शियल विज्ञापन प्रसारण के, उनकी शवयात्रा का सजीव प्रसारण किया| यहाँ तक अंतिम संस्कार के दो दिन बाद तक राजेश साहब टीवी, रेडियो और अखबारों के पन्नों पर छाए रहे| उन्हें ऐसी प्रसिद्धि और ख्याति मिलनी भी चाहिए क्योंकि राजेश खन्ना ही बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार थे| 
                                      राजेश साहब की मृत्यु के एक हफ़्ते बाद यानी २६ जुलाई को जब मैनें अखबार उठाया तो वही रोज़ की घटनाओं से पूरा अखबार पटा पड़ा था; बलात्कार, चोरी, लूट-पाट और हत्याओं जैसी घटनाओं से रंगे थे पन्ने! और कुछ पन्ने देश के भावी राष्टपति प्रणव मुखर्जी के नाम थे| टीवी खोल कर देखी तो समाचार वक्ता भी एक ही सुर-लय-ताल में उन्हीं घटनाओं को सिलसिलेवार तरीके से सुनाने में व्यस्त नज़र आया| लेकिन मुझे इन घटनाओं को सुनने और पढ़ने में कोई रुचि या दिलचस्पी नहीं थी|

मैं तो एक विशेष खबर ढूंढ रही थी, वो खबर जो हमारे देश के रियल हीरोज़ से जुडी थी, पर अफ़सोस मुझे यह खबर कहीं नहीं मिली; न देश के सर्वोच्च दैनिक समाचार पत्र मैं और न राष्ट्रीय समाचार चैनलों में!
यह खबर थी १९९९ के कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों की स्मृति और सम्मान में मनाए जाने वाले विजय दिवस के बारे में; २६ जुलाई १९९९ को भारतीय सेना ने पाकिस्तान को कारगिल के मैदान-ए-जंग में क़रारी शिकस्त देकर जीत हासिल की थी|
भारतीय सेना ने इस जीत में अपने ५३५ जवान खो दिये, न जाने कितने लापता हो गए| पर अफ़सोस १३ वर्ष पूर्व हुए कारगिल युद्ध और शहीद हुए जवानों को प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माडिया में से किसी ने कोई स्थान नहीं दिया| हाँ फेसबुक पर विजय दिवस से जुड़े कुछ पोस्ट देखने को ज़रूर मिले|

पर क्या इतना काफ़ी है; उन वीर जवानों के सम्मान के लिए! जो बिना स्वार्थ के अपने प्राण देश और देशवासियों पर न्यौछावर करते है| हँसते-हँसते अपने सीने पर गोली खाते और उन्हें देश के समाचार पत्रों में ४ इंच का एक कॉलम तक नहीं मिलता| हमारे जवान मैदान-ए-जंग में किसी मान-प्रतिष्ठा या राष्ट्रपति 
द्वारा दिए जाने वाले मेडल और प्रशश्ति पत्र के लिए नहीं शहीद होता है पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम अपने जवानों के सम्मान को गिरने न दे|

हम रजतपटल पर मरते आनंद को देखकर आंसू बहाते है जबकि हमें बखूबी पता होता है कि उस मृत्यु दृश्य को सजीव बनाने के लिए अभिनेता बार बार रीटेक देता है और वह वास्तविक जीवन में जीवित भी है, लेकिन फिर भी सिनेमाघरों से निकलते वक्त हम ग़मज़दा होते है क्योंकि हमारा प्रिय अभिनेता फ़िल्म में मर गया है|
जबकि सीमा पर लड़ते मरते जवानों के पास रीटेक का वक्त ही नही होता... वह एक ही टेक में दुश्मन को मार गिराता है या उसकी गोली से हमेशा के लिए मर जाता है|  फिर भी हम उन्हें आसानी से भूल जाते है जबकि वो दोबारा ज़िंदा भी नहीं होते|
हमारी संसद या सीमा पर जो जवान मारे गए है, वो सब हमारी रक्षा करते हुए शहीद हुए है फिर भी हम उनकों बड़ी आसानी से भूला देते है और चलचित्र के अभिनेताओं को याद करते रहते है| 

हमारी निर्लज्जता की अब तो हद भी पार हो गई है| हम संसद और मुंबई जैसी आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले आतंकियों को पिछले १० सालों से जेल में बिठा कर पनीर-बिरयानी खिला रहे है| देश का यह कृत उन शहीदों के बलिदान को व्यर्थ साबित करता है| अफ़जल गुरु की फांसी की सजा विचाराधीन होना, हमारे सैनिकों के बलिदान और सम्मान पर बेहद शर्मनाक मज़ाक है| आतंकी पड़ोसी देश हमारे जवानों के शरीर से आँखें, नाखून और बाल नोंच कर हमें उनका क्षत-विक्षत शव वापस करता है और हम उसी आतंकी पड़ोसी देश की तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाने की सोच रहे है, देश और सरकार का यह कदम हमारे देशभक्त वीर जवानों की वीरता को अपमानित करने वाला कदम है| 

पर ग़लती सरकार या उस पड़ोसी देश की नहीं है| ग़लती हमारी है आम नागरिकों की; जो देश के सच्चे नायकों को अनदेखा कर आभासी नायकों के लिए आँसू बहाती है, वाहवाही करती है| अखबार और न्यूज़ चैनल भी बॉलीवुड अभिनेताओं के इतिहास-भूगोल की पूरी पूरी सही जानकारी आम जनता तक पहुँचाने में एक सक्रीय भूमिका निभाते रहते है पर इन सूचना-प्रसारण प्रमुखों के पास सीमा पर लड़ते जवानों की कोई जानकारी नहीं होती क्योंकि रियल हीरो की जिंदगी में कोई चटपटा मसाला और रोमांच नहीं होता, जिसे देखाकर ये पैसे कमा सके! सभी टीवी चैनल बॉलीवुड हिरोइनों के अंगप्रदर्शन को बड़ी प्रमुखता और चाव से दिखता है पर मैदाने-जंग में शहीद हुए जवान के घर की हालत नहीं दिखाता है| सबसे बड़ा सच तो ये है कि हम स्वयम सच्चाई नहीं देखना चाहते| अपने सैनिकों के बारे में कुछ नहीं पढ़ना चाहते और न कुछ जानना चाहते है क्योंकि उनके जीवन में कोई रोमांच नहीं है, कोई चटपटी मसालेदार कहानी नहीं है|

हम अपने घरों में एसी चला कर बड़े आराम से निर्भीक होकर सोते है, बिना किसी डर के दफ़्तर जाते है क्योंकि हमने अपने देश की सीमाओं पर लाखों वफ़ादार, निष्ठावान और बहादुर पहरेदार खड़े कर रखे है पर कभी सोचा है, सैनिकों और उनको परिवार के प्रति हमारी यह उदासीनता और लापरवाही, सैनिकों में एक दिन रोष का कारण भी बन सकती है! हमारी ऐसी कृतघ्नता देखकर अगर सैनिकों ने लड़ने से मना कर दिया और सीमा छोडकर अपने अपने घरों में वापस चले गए... तो हम कहाँ के रह जाएगें!

इसलिए सिर्फ १५ अगस्त और २६ जनवरी के अलावा भी हमें अपने देश के सैनिकों को सम्मान देना चहिये| उनके निस्वार्थ बलिदान को मान देना हमारा फ़र्ज़ होना चाहिये| हमें उनका और उनके परिवार का आभारी होना चाहिए क्योंकि उनके साहसों और वीरता की बदौलत ही हम ज़िंदा और सुरक्षित है न कि किसी बॉलीवुड हीरो की फ़िल्मी बहादुरी के चलते|

जय जवान, जय हिंद!!!

Wednesday, 13 June 2012

मंदिर के लड्डू

एक पुरुष  का प्रेम अक्सर नारी की देह पर आकर ही क्यों खत्म हो जाता है? क्या एक औरत देह से ज्यादा कुछ नहीं उसके लिए? पुरुष के हृदय में नारी के प्रति प्रेम कम और मस्तिष्क में वासना अधिक होती है| शायद यही मुख्य वजह है औरतों के साथ बलात्कार का|
अक्सर पुरुषों की शिकायत होती है कि औरतें ही उन्हें उकसाती है... कभी अश्लील और उत्तेजक कपड़ो से, कभी मुखर प्रतिक्रिया से...
पर  जब बलात्कार आठ नौ साल की लड़की के साथ होता है तो क्या वो लड़की भी अश्लील इशारे करती है एक अधेड़ आदमी को! जो नपुंशक आदमी उसका बलात्कार करते है|

वेश्यावृत्ति से घिरी औरतें समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखी जाती क्योंकि वो  औरतें एक से ज़्यादा पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाती है जबकि आदमी भूल जाता है कि उन औरतों को वैश्या बनाने में वो ही शतप्रतिशत भागीदार है| 
पुरुष, एक वैश्या से उत्पन्न अपनी ही बेटी से शारीरिक संबंध बनाता है और औरत को उसकी हद बताता है! 

जिस औरत को सुबह दिन के उजाले में वैश्या की गाली देते, उसी औरत के साथ रात में बिस्तर पर मर्द होने का दम्भ भरते!
एक औरत कभी अपनी मनमर्ज़ी से वैश्या नहीं बनती... वो पुरूष ही है जो घर में बीवी के होते बाहर मुहं काला करता है और औरत को वेश्यावृत्ति करने पर मजबूर करता है|

अभी कुछ महान आदमी बोलोगें... हम जबरदस्ती तो नहीं करते है, किसी के साथ!  पर अगर कोई औरत न माने तो उसपर तेज़ाब डाल देते है, अगवा करवा देते है और कहते है साली मान नहीं रही थी  |

अगर आदमी अपनी बीवी से प्यार करता है तो बाहर मुहं मारने क्यों जाता है? सच तो ये है कि आदमी वासना में लिप्त है उसे अपनी मर्दानगी  दिखाने के लिए १० औरतें चाहिए  |

हमेशा औरतों से ही सुचिता की उम्मीद क्यों की जाती है ? 
एक पुरुष दुनियाँ की हर औरत को भोगना चाहता है, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहता है परन्तु शादी उस लड़की से करना चाहता है जिसका कभी किसी के साथ "चक्कर" न चला हो | किसी और पुरुष ने उसका शीलहरण न किया हो |

अजीब सी दोहरी मानसिकता है पुरुष की... दारुखाने में बैठकर  दोनों हाथों में लड्डू चाहिए वो भी मंदिर के!!! 

Sunday, 10 June 2012

कैसे रिश्ते !




"अपने तो अपने होते है बाकी सब सपने होते है" 
ये बात कितनी सही है और कितनी गलत,  इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है|
मेरे घर के ठीक सामने एक तिमंजिला मकान है... जो पिछले एक सप्ताह से तोड़ा जा रहा है और लगभग आधे से ज्यादा टूट चुका है|

मकान मालिक को मैंने कभी नहीं देखा,  शायद उनकी मृत्यु  बहुत  पहले हो चुकी है और अपने पीछे वो अपनी पत्नी,  दो बेटियाँ और चार बेटे छोड़ गए और ये मकान(जो हाल में तोड़ा जा रहा है)|  मरने से पहले वो अपने सभी कर्तव्य पूरे कर चुके थे |
मकान मालिक महोदय ने अपने ज़िंदा रहते ही अपनी वसीयत बना दी थी,  जिसमें भूमितल और द्वितीय तल अपने सबसे छोटे बेटे के नाम कर दिया|  प्रथम तल बाकी बचे अपने तीन बेटों में बाँट दिया| 
और मकान मालिक की पत्नी छोटे बेटे के हिस्से में आई| बेटियों को तो अपने समाज में वैसे भी कुछ नहीं दिया जाता है,  ऊपर से ब्याहता बेटियों को तो कुछ भी नहीं,इसलिए उनकों कुछ नहीं मिला| 

छोटे बेटे ने कुछ दिनों तक अपनी माँ को साथ रक्खा और एक दिन उसने अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दिया|  वो और उसकी पत्नी एक बूढी माँ खाना नहीं दे सकते है,  रहने को एक कमरा नहीं दे सकते है और पहनने को एक सूती धोती | 
बेचारी बेबस माँ क्या करती ? बैठी रही मौत के इंतज़ार में...पर मौत नहीं आई | मौत की बज़ाय छोटी बेटी आ गई और माँ को अपने साथ लेकर चली गई|
आज वो बूढी माँ ज़िंदा है या मर गई,  मुझे नहीं पता... मैं यहाँ बेटी की प्रशंसा नहीं करना चाहती! 

बेटों ने मकान बेच दिया और कीमत आपस में बाँट ली| प्रश्न तो ये है कि एक पति ने सही किया अपनी पत्नी के साथ? जिस औरत का हाथ पकड़ कर सात फेरें लिए थे, उसके बुढ़ापे के लिए एक बोरा अनाज को अपनी वसीयत में जगह न देना सही है? जिस औरत के साथ मिलकर उसने अपने वंश को बढ़ाया,  उसको बुढ़ापे में तन ढकने के लिए दो धोतियो का पैसा नहीं देना... सही है?
जिस औरत ने पति के साथ मिलकर अपने  हाथों से घर बनाया था, क्या उसके नाम पर एक कमरा नहीं करना चाहिए था? क्या  अपनी  पत्नी  को  बेटों  के  आश्रित  छोड़ना  सही  निर्णय  है? 

औलादें तो नालायक होती है,  पर वो पति कैसे इतना निष्ठुर हो सकता है, जिसके सुख दुःख में औरत बराबर साथ देती है!

भारत में आज भी औरतें अपना अलग वज़ूद नहीं तलाशती,  वो किसी की बेटी, पत्नी और माँ बन कर ही खुश है पर सम्मान की दो रोटी की उम्मीद तो रख ही सकती है अपने पति और अपने बेटे से?
समझ पाना बहुत ही मुश्किल है कि कौन अपना है... वो पति;  जिसके सुख दुःख को अपना समझा, जिसके वंश को आगे बढ़ाया, जिसके नाम पर अपनी पूरी जवानी कर दी|
या फिर वो औलादें जिनको नौ महीने अपनी कोख में पाला, जिनका मल-मूत्र साफ़ किया,अपना खून जला कर दूध पिलाया! या फिर कोई नहीं है...

क्या औरतें! सुबह खाना बनाने वाली नौकरानी और रात में सिर्फ सोने भर की चीज़ है?