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Wednesday, 22 August 2012

Keep Distance


“keep distance” या “एक निश्चित दूरी बनाएं रखें”, हम यह जुमला सड़क पर दौड़ते वाहनों के पीछे लिखा देखते हैं| शायद ही कोई ऐसा वाहन होगा जिसके पीछे यह न लिखा हो| हम इस जुमले के साथ साथ कुछ और जुमले मसलन “जगह मिलने पर पास दिया जाएगा”, “bolw horn” और “use dipper at night” हर वाहन के पीछे लिखा देखते हैं और दिन में कई बार पढकर आगे बढ़ जाते हैं| असल में यह सब जुमले नहीं बल्कि यातायात के नियम हैं, जो हर वाहन के पीछे इसलिए लिखे होते है कि हम वाहन चलाते समय कोई नियम भूले नहीं| जब भी हम कोई वाहन चलाते हैं, हमें हमेशा इन नियमों का ध्यान रखना होता है| अगर हम कभी इन नियमों की अनदेखी करते हैं तो हम किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या कोई दूसरा हमारी ग़लती का शिकार हो जाता है| कभी कभी इन नियमों की अनदेखी करना जीवन पर भारी पड़ जाता है| यातायात के यह सारे नियम इसलिए बनाए जाते है जिससे सड़क पर दौड़ता जीवन सुगम और सुरक्षित रहे| कोई हताहत या चोटिल न हो|

आज इन यातायात के नियमों को सड़क पर लागू न करके अपने जीवन पर लागू करते है और देखतें है कि इन नियमों का हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है|
सबसे पहले बात करते हैं “keep distance” की, मतलब एक निश्चित दूरी बनाए रखें; पर सवाल उठता है कि किससे निश्चित दूरी बनाकर रखें और क्यों? तो इस सवाल का सीधा-सा उत्तर है, हमें हमारे जीवन में पहले से मौजूद या भविष्य में आने वाले रिश्तों से हमेशा एक दूरी बनाकर रखनी चाहिए| क्योंकि बहुत ज़्यादा नज़दीकिया अक्सर कड़ुवाहट को जन्म दे देती है| कभी-कभी स्नेह के कारण हम अपने रिश्तेदारों, मित्रों के इतने करीब हो जाते हैं कि वह हमारा फ़ायदा उठा लेते हैं| प्रेम और विश्वास के चलते हम उनकों अपने राज़, अपने जीवन की कड़वी सच्चाई बता देते हैं, क्योंकि हम उनको अपना विश्वासपात्र समझते है जबकि सच्चाई इसके एकदम उलट होती है| अवसर आने पर वो लोग हमारे राज़ सबके सामने खोलने से हिचकते तक नहीं हैं और कभी कभी तो हमको ही डराते-धमकाते रहते हैं और हम उनकी हर सही-ग़लत बात को मानने के लिए मज़बूर होते है| 

अब मन में एक और प्रश्न उठता है कि क्या सभी रिश्ते ऐसे ही होते हैं? जहाँ तक मेरा मानना है तो लगभग सभी रिश्ते ऐसे ही होते है| क्योंकि हमारे साथ विश्वासघात हमारा विश्वासपात्र ही करता है| इतिहास उठाकर देखगें तो बहुत से उदाहरण मिल जाएगें कि कैसे विश्वासपात्रों ने अपने मित्रों, मालिकों और रिश्तेदारों के साथ विश्वासघात किया| जीवन जीने के लिए लोगों पर विश्वास करना आवश्यक है पर किसी के ऊपर अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए| अगर हम किसी के ऊपर अन्धविश्वास करते हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि सामने वाला कुछ भी करे पर हमने अपनी आँखें बंद कर ली हैं| वह कुछ भी करे हमें उसका विरोध नहीं करते क्योंकि हम मानने लगते है कि सामने वाला हरदम सही ही है| अक्सर हम जिसके बारे में यह धारणा बना लेते हैं कि वह कभी ग़लत नहीं हो सकता; वही व्यक्ति हमें कदम कदम पर ग़लत साबित करता है और एक वक़्त ऐसा आता है कि हम सब कुछ अपने अन्धविश्वास के चलते हार जाते हैं|

जब हमारा राज़दार ही हमारा राज़ सबके सामने खोल देता है तो हमें बहुत आश्चर्य होता है| हमें उसकी गद्दारी पर यकीन नहीं होता है पर ग़लती सामनेवाले की नहीं, हमारी होती है| जब हम खुद अपना राज़ अपने तक सीमित नहीं रख पाए तो हमारा मित्र या रिश्तेदार उस राज़ को राज बनाकर क्यों रखेगा? हम अक्सर लोगों को अपना राज़दार उस समय बनाते है जब हम बहुत खुश होते है या बहुत दुखी होते हैं| इन स्थितियों में हम अपना विवेक खो बैठते है और सब कुछ लोगों को बता जाते हैं| इसलिए इन विकट परिस्थितियों में हमें हमेशा अपने दिमाग़ की लाल बत्ती जला कर रखनी चाहिए| लाल बत्ती बोले तो “use dipper at night”... जैसे रात में चलते वाहन हमेशा लाल बत्ती जलाकर रखते हैं, हमें भी हमेशा सतर्क रहना चाहिए| कभी भी अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि खुली किताब जल्दी पीली पड़ती और फटती है| लेकिन इसका यह अभिप्राय भी नहीं है कि हम ज़िन्दगी की किताब को बंद अलमारी में दीमकों को चाटने के लिए छोड़ दें| किसी को कुछ बताने से पहले हमेशा यह सोच लेना चाहिए कि हमारे द्वारा दी गई जानकारी से भविष्य में हमें तो कोई परेशानी तो नहीं होगी|

अब बात आती है “blow horn” की, इस नियम का प्रयोग जितना सड़कों पर वाहन दौड़ाते हुए किया जाता है उसका १ प्रतिशत भी हम अपनी ज़िन्दगी में नहीं करते हैं| अक्सर देखा जाता है कि हमारे आस-पास के लोग ही हमें बार-बार चोट पहुँचाते हैं| हमारा और हमारी भावनाओं का मजाक उठाकर हमें आहत करते पर हम उनसे चाहकर भी कभी कुछ कह नहीं पाते क्योंकि वह सब लोग हमारे अपने होते है| हम उनसे संबंध खराब नहीं करना चाहते और सोचते रहते हैं कि सब अपने आप ठीक हो जाएगा पर ऐसा नहीं होता| इन स्थितियों में घुट-घुट कर जीने से बेहतर है कि हम सामने वाले को साफ़ लफ़्ज़ों में समझा दें कि दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए| किसी को किसी के मान-सम्मान को आहत करने का कोई हक़ नहीं है| हम सबको यह समझना चाहिए कि अपनी स्वंतत्रता वहाँ समाप्त हो जाती है जहां से किसी दूसरे की नाक शुरू होती है| जैसे समय पर बजाया गया हार्न एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो रोक लेता है ठीक वैसे ही समय रहते लोगों को अपना नज़रिए और अपने प्रति उनका व्यवहार कैसा हो,  अच्छी तरफ़ समझा देना चाहिए| पर कई बार ऐसा होता है कि लोगों को बार बार समझाने और बताने पर भी उनको बात समझ में नहीं आती है| बार-बार वो हमारे साथ वैसा व्यवहार करते रहते हैं जिसके लिए हम उन्हें मना कर चुके होते है और तो और जब हम उन्हें टोकते है तो वो माफ़ी मांग लेते है और आइंदा ऐसा न करने का वादा करते है पर चिकने घड़े पर पानी कितनी देर टिकता है, यह तो सभी जानते हैं|

माना रिश्ते बनाने में वर्षों लग जाते हैं पर बार-बार समझाने पर भी जब कोई कुछ समझना ही नहीं चाहता तो हम क्यों हर बार किसी की बातों से अपने मन को आहत करें| हम किसी को खुश करने तथा उसके साथ रहने के लिए क्यों अपने आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाएं? क्यों घुट-घुट कर जिएँ? हमें समय रहते इन रिश्तों से दूरियाँ बना लेनी चाहिए| दुनियाँ क्या कहेगी? समाज में हमारी बे-इज्जती हो जाएगी... इन बातों को हमें दरकिनार कर देना चाहिए| हमें ज़िन्दगी खुश रहकर जीने के लिए मिली है न कि घुट-घुटकर मरने के लिए| शायद इसीलिये हर वाहन के पीछे लिखा होता है, “जगह मिलने पर पास दिया जाएगा”| रिश्ते टूटने पर दुःख और तकलीफ़ें तो ज़रूर होती हैं पर कुछ समय बाद सब पहले जैसा सामान्य और सुंदर हो जाता है|

वैसे तो यह सारे नियम यातायात को सुगम और सरल बनाने के लिए बनाए गए हैं पर हम इन नियमों के प्रयोग से अपने जीवन के यातायात को भी सरल बना सकते है| बस ज़रूरत है तो इन नियमों को अपने जीवन में कड़ाई से लागू करने की और यह पहचानने की कि कौन सा नियम कहाँ और कब लागू करना है|


Friday, 10 August 2012

वो कबूतर का बच्चा!


­जब मन में अनहोनी की आशंका होती है और वह घटित हो जाती है, तो हृदय दुःख और विषाद से भर जाता है| कल रात जब मैं सोने जा रही थी मुझे यकीन था कि सुबह उठकर मुझे शतप्रतिशत दुखद समाचार से दो चार होना पडेगा और वैसा हुआ भी! आज सुबह उठकर जैसे ही आशंकित मन के साथ; मैं अपने आंगन में पहुँची, मेरी माँ ने मुझे वह दुखद समाचार सुना दिया... मैं समाचार सुनकर सिर्फ इतना ही बोल पाई “मुझे तो पता था यहीं होगा”| मेरा हृदय दुःख से भरता जा रहा था, मन मायूस हो गया| मेरी नज़रे उस छोटे-से कबूतर के बच्चे को लगातार ढूंढ रही थी और दुआ कर रही थी, काश! वह वापस आ जाए| हमने दो बार उसे बचाया था पर आज शायद उसकी किस्मत अपना खेल दिखा गई थी| आंगन में बस उस छोटे-से कबूतर की माँ बार-बार गूंटर गूं गूंटर गूं करके इधर-उधर उड़कर अपने बच्चे को ढूंढ रही थी| कभी आंगन की मुंडेरों पर बैठकर अपने बच्चे को पुकारी तो कभी रोशनदान पर अपना बार-बार सिर पटकती| उसकी आवाज में इतनी वेदना थी कि मेरा हृदय फटा जा रहा था| मैं अभी किसी की माँ नहीं हूँ फिर भी आज मेरा ह्रदय उस कबूतर के बच्चे के लिए तड़प रहा था| मुझे लग रहा था जैसे मेरा बच्चा मुझसे दूर हो गया है| मैं सिर्फ यही सोच रही थी उस माँ की हालत क्या हो रही होगी; जिसने इसे जन्म दिया, सेया है, रोज़ उसके लिए दाना लाती है|

बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया था, उसे उड़ना सीखे हुए दो-चार दिन ही हुए थे; इसलिए मेरे आंगन में बने अपने घोंसले से निकल कर मुंडेरों पर चीं चीं करते हुए फुदकता उड़ता फिरता था| उसकी उड़ान सीमा महज़ पन्द्रह फुट से ज़्यादा नहीं थी इसलिए सिर्फ आँगन, बरामदे में ही घूमता रहता था और अगर थोड़ा जोश में आ गया तो छत की मुंडेर के एक-आध चक्कर काट कर फिर नीचे आ जाता था| उस नन्हें-से बच्चे के सिर्फ दो ही काम थे; एक तो इधर उधर उड़ना और दूसरा पूरे आंगन में बीट करना| उसकी बीट से पूरा आंगन और आंगन में रक्खा सारा समान गंदा हो रहा था पर हमको कोई आपत्ति नहीं थी | हम उनपर ध्यान भी नहीं देते कि वह और उसकी माँ क्या कर रहे है? लेकिन आज जब बच्चा हमारी नज़रों के सामने नहीं था तो हम सब सिर्फ उसकी ही बातें कर रहे थे; सारा दिमाग उस बच्चे पर टिक-सा गया था| उसकी माँ की तड़प और दर्द, हमारी रही-सही वेदना को खरोंच-सी रही थी| उसकी माँ के साथ-साथ हम भी उस नन्हें से बच्चे के लिए विकल हो रहे थे| मानों ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना हमारे सीने में बिछोह का खंज़र घोंप कर हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गया है और हम सीने में दर्द लिए जीवित रहने के लिए मज़बूर हैं|

उस माँ की हालत हम समझ रहे थे जो हमेशा के लिए अपने नन्हें-से बच्चे से बिछड़ गई थी और इस बिछोह का ज़िम्मेदार कोई और नहीं मेरा भाई था| मुझे रह-रह कर अपने भाई पर गुस्सा आ रहा था; उसको क्या जरूरत थी; रात में उस नन्हें-से बच्चे को मुंडेर से उड़ाने की? उसने अपनी बीट से सिर्फ आंगन ही तो गंदा किया था, वह पानी से धोकर साफ़ कर लिया जाता| दो दिन पहले, पापा उसे मारने जा रहे थे क्योंकि वह बार बार उड़कर रसोईघर में घुसने की कोशिश रह रहा था तब नानी अम्मा और मैनें मना किया| परसों भाई को परेशान कर दिया तो वह मारने जा रहा था; तब माँ ने उसे रोक लिया और कहा “जाने दो, बेचारा बेजुबां पक्षी ही तो है, क्यों मारोगे उसे” पर कल रात को उसने पूरा आंगन अपनी बीट से गंदा कर दिया तो भाई ने उसे मारने की बजाय उड़ा दिया| भाई ने उसे मारने की बजाय उडाकर, काम तो अच्छा किया था पर वो नन्हा-सा बच्चा उड़कर अपने घोंसले में जाने की बजाय ऊपर छत की ओर उड़ गया|

जैसे ही उसके उड़ने की फड़फाड़ाहट की आवाज़ माँ और नानी अम्मा के कानों में पड़ी; वे दोनों भाई से नाराज़ हुई “क्यों रात में उसे उड़ा दिया? अब उसे कोई बिल्ली नोंच डालेगी! अब वह जिंदा नही बचेगा”, मुझे भी भाई की इस हरकत पर गुस्सा आया| हमारी छत पर अक्सर बिल्लियाँ आती हैं जो पक्षियों के छोटे छोटे बच्चों पर झपटकर अपना शिकार बनाती हैं| इसी बात से हम सब आशंकित और दुखी थे कि वह कबूतर का बच्चा भी किसी बिल्ली का आहार बन जाएगा| हम सबको दुःख तो था लेकिन वह हमारा बच्चा नहीं था इसलिए हम उसे ढूँढने भी नहीं गए | बस हम सब दुआ कर रहे थे कि वह नन्हा-सा बच्चा बच जाए| रात गहराती गई और हम सो गए| लेकिन जब सुबह उठकर कबूतर के बच्चे को आंगन में नहीं पाया तब हमें लग रहा था कि जैसे कोई अपना हमसे दूर चला गया है| हमें उसके जीवित बचने पर शक तो रात से था, लेकिन सुबह शक और गहरा हो गया जब बच्चे को आंगन में नहीं पाया; उसपर उस बच्चे की माँ का विलाप, हमें यकीन दिलाने के लिए काफ़ी था| हम दुःख और संताप से भर गए थे| कबूतरी परेशान-सी आंगन का कोना कोना छान रही थी और जब बच्चा आंगन में नहीं मिला तो उसकी तलाश में वह छत पर उड़ गई| यह घटनाक्रम करीब दो घंटे चलता रहा और हम बेबस मूकदर्शक बने देखते और दुखी होते रहे|

अचानक दीदी चिल्लाई “देखो! बच्चा!!!” यह क्या! अचानक से कबूतरी अपने बच्चे को कहीं से ढूंढ लाई! पर कहाँ से? शायद रात में डरकर बच्चा कहीं छुपकर बैठ गया होगा, जब सुबह अपनी माँ की करुण पुकार सुनी तो बाहर आ गया होगा| बच्चे को देखकर हमारा दुःख जाता रहा, हम खुशी से झूम उठे| हमारे होठों पर एक मील लम्बी मुस्कान थी, हृदय आनंद से भरा हुआ था|
दीदी फिर से बोली “आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान किसी को दुःख नहीं दे सकते”, शायद यह बात सत्य भी है| कबूतर का बच्चा और उसकी माँ बहुत खुश है, वह दोनों सुबह से साथ साथ हैं| शायद भाई की कल वाली हरकत से वह दोनों इतना भयभीत है कि वह छत की मुंडेर से नीचे आंगन में नहीं आए हैं|

अब मैं सिर्फ इतना ही सोच रही हूँ कि जो दर्द और दुःख हमें हो रहा था, भाई को क्यों नहीं हुआ? पापा को उस बच्चे से ममता क्यों नहीं हुई? उसकी बीट हम औरतों को ही दिनभर साफ करनी पड़ती है फिर भी हमें उस पर गुस्सा नहीं आया| क्या सच में पुरुष के सीने में ममता और प्रेम नहीं होता? क्या ईश्वर ने उसकी प्रकृति निष्ठुर ही बनाई है? उस बच्चे को अगर कोई बिल्ली खा जाती तब पापा और भाई को संताप होता? क्या वे दोनों उसकी मौत को आसानी से भुला देते? बहुत से सवाल मेरे मन में उठ रहे है, जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है|
पर आज मैं और घर की सभी औरतें खुश हैं कि कबूतर का छोटा-सा बच्चा जीवित है| हम यही कामना करते हैं कि वह बच्चा चिरंजीवी हो|

श्रीकृष्ण प्रेम के देव है, विश्व में व्याप्त सम्पूर्ण प्रेम का केन्द्र श्रीकृष्ण ही हैं| इसलिए आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ, “हे नाथ! थोड़ा सा प्रेम और ममत्व का संचरण पुरुष हृदय में भी करें”|


Wednesday, 1 August 2012

अतीत

गूगल से साभार 
अतीत, जीवन का वह पल है जिसको हम भविष्य का साथ पाने के लिए, अपने वर्तमान के पीछे छोड़ आए हैं| जो आज अभी है, वो दिन ढलने के बाद अतीत बन जाता है| अतीत की स्मृतियों के चिन्ह सदैव हमारे साथ रहते हैं|  हमारा अतीत ही हमें हमारे होने का एहसास करता है| न चाहते हुए भी हम हमेशा अपने अतीत से जुड़े रहते है क्योंकि हमारा अतीत हमारे अस्तित्व का एक साक्ष्य है| अतीत हमारे जीवन का एक हिस्सा है, जिसे न तो फिर से बनाया जा सकता है और न कभी पूर्णतयाः मिटाया जा सकता है| अक्सर जब भी अतीत का प्रसंग आता है; हम सबको अपने अतीत में की गई गलती या दुखद घटनाएं ही याद आती हैं क्योंकि हमारे द्वारा की गई गलती, हमेशा हमारी अंतरात्मा को कचोटती रहती है| ऐसा नहीं है कि अतीत कभी सुन्दर नहीं हो सकता परन्तु सुखद यादें समय के साथ धूमिल हो जाती है, जिसे हम आसानी से भूल जाते है और इसीलिये अतीत हमें कटु एवं कष्टकारी लगता है|


हम अपने अतीत से बचने के लिए हर संभव कोशिश करते है; कभी किसी का सहारा लेते तो कभी खुद को कमरे में बंद करके अतीत से भागते  हैं| लाख दरवाजे बंद कर लेने बावज़ूद अतीत हम पर हमेशा हावी रहने की कोशिश में रहता है; अपनी तरफ़ मज़बूती से खींचता है| अतीत पर चाहें जितने भी पहरे लगाओ, वह पल भर में बंधन मुक्त होकर हमारे सामने मुंह उठाकर खड़ा हो जाता है और हम कुछ नहीं कर पाते हैं| अतीत बेरहम होता है, सबके सामने हमारी इज्ज़त तार तार करने की हर बार धमकी देता है| हमें डरा कर अपने बाहुपाश में बांधे रखता है|


समय के साथ परिवेश बदल जाते हैं, रिश्ते बदल जाते हैं, आबोहवा बदल जाती है, यहाँ तक कि लोगों की पहचान बदल जाती है पर अतीत कभी नहीं बदलता| हमारी लाख कोशिशों के बावजूद भी हम अपने अतीत के भयानक चंगुल से नहीं बच पाते हैं| हमारे मरने के बाद भी अतीत कभी भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता है, वह स्वयं जीवित रहता और हमें भी जीवित रखता है| अतीत, हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों ही निगल जाने के लिए आतुर रहता है| हमें बर्बाद करने का रोज़ एक नया पैतरा ढूढ़ता रहता है और अक्सर हमें बर्बाद कर भी देता है|


पर ऐसा नहीं है कि हम इस अतीत नामक दानव पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं; क्योंकि इस मृत्युलोक में सबका का अंत निश्चित है| सत्य को स्वीकार करने की क्षमता ही मात्र एक ऐसा अस्त्र है, जिससे अतीत को भी मारा जा सकता है| सत्य को स्वीकार करके हम अपने दुखद अतीत के सम्पूर्ण साम्राज्य का अंत कर सकते हैं|  यदि हमें अपना वर्तमान और भविष्य दोनों सुंदरतम एवं शांतिपूर्ण चाहिए तो अतीत का सत्य कितना भी कटु क्यों न हो; हमें दृढ़ता एवं विनम्रता के साथ उसे स्वीकार कर लेना चहिये; क्योंकि अतीत एक सत्य है और सत्य को न तो हराया जा सकता है और न कभी छुपाया जा सकता है|


यदि समय रहते गलती को सुधारा न जाए तो यही गलती भविष्य में अतीत का विकराल रूप लेकर हमारे सामने आती है और हमारे मान सम्मान को तार तार कर देती है; हमारी प्रतिष्ठा पर गहरा आघात करती है|  गलती करना मनुष्य का स्वभाव है, अक्सर बाल्यावस्था में की गई गलतियाँ क्षम्य होती हैं क्योंकि बचपन विवेकरहित एवं बोधराहित होता है| परन्तु युवावस्था में की गई गलतियों की सजा हमें वृद्धावस्था में ब्याज सहित चुकानी पड़ती हैं|


जैसा कि आजकल देश के एक वरिष्ठ नेता जी के साथ हो रहा है| नेता जी के पलभर छलावे सुख की लालसा ने उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई इज्ज़त को सरेआम नीलम कर दिया| उनके अतीत से वह जितने शर्मसार हुए हैं, उससे कहीं ज्यादा उनका परिवार शर्म झेल रहा है| हम नेता जी को अविवेकी नहीं कह सकते क्योंकि वह  देश और समाज से जुड़े निर्णय ले रहे हैं| अगर उन्होंने जोश में अपने होश न होए होते तो शायद आज उनकी समाज में इतनी किरकिरी न हो रही होती| इस कृत्य में नेता जी और उनकी सहभागी दोनों की ही बराबर के ज़िम्मेदार हैं परन्तु बेइज्जती सिर्फ नेता जी की हुई क्योंकि नेता जी सच्चाई को सिरे से नकार रहे थे|
गर नेता जी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली होती तो शायद उनके अतीत ने उनके वर्तमान को पानी-पानी न किया होता|


अतीत, संदूक में बंद लाश के समान है जिस पर चाहें जितना भी चन्दन का इत्र लगाओ, खुलने पर सड़ांध आती ही है| 

Friday, 27 July 2012

रियल हीरोज़


कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे वीर जवान  

पिछले सप्ताह सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर एक ही खबर छाई थी और सभी लोग उस खबर को देखने, सुनने और पढ़ने में व्यस्त थे| यह बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना की मृत्यु की खबर थी, जिससे पूरे देश में एक शोक की लहर दौड़ गई| सभी अपने अंदाज में राजेश खन्ना साहब को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे| सोशल नेटवर्किंग साइट्स ट्वीटर और फेसबुक पर तो लोग अपनों की मृत्यु से ज्यादा दुखी और ग़मज़दा दिखे|
रेडियो चैनल भी पूरी तन्मयता के साथ राजेश साहब से जुड़े हर छूए-अनछुए पहलूओं को देश की आम जनता के बीच बिना किसी अवरोध के प्रसारित करने में जुटा था| पूरे दिन टीवी और रेडियो में उनकी ही फिल्मों के गीत बजते रहे और दूसरे दिन हर टीवी चैनल ने बिना किसी कॉमर्शियल विज्ञापन प्रसारण के, उनकी शवयात्रा का सजीव प्रसारण किया| यहाँ तक अंतिम संस्कार के दो दिन बाद तक राजेश साहब टीवी, रेडियो और अखबारों के पन्नों पर छाए रहे| उन्हें ऐसी प्रसिद्धि और ख्याति मिलनी भी चाहिए क्योंकि राजेश खन्ना ही बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार थे| 
                                      राजेश साहब की मृत्यु के एक हफ़्ते बाद यानी २६ जुलाई को जब मैनें अखबार उठाया तो वही रोज़ की घटनाओं से पूरा अखबार पटा पड़ा था; बलात्कार, चोरी, लूट-पाट और हत्याओं जैसी घटनाओं से रंगे थे पन्ने! और कुछ पन्ने देश के भावी राष्टपति प्रणव मुखर्जी के नाम थे| टीवी खोल कर देखी तो समाचार वक्ता भी एक ही सुर-लय-ताल में उन्हीं घटनाओं को सिलसिलेवार तरीके से सुनाने में व्यस्त नज़र आया| लेकिन मुझे इन घटनाओं को सुनने और पढ़ने में कोई रुचि या दिलचस्पी नहीं थी|

मैं तो एक विशेष खबर ढूंढ रही थी, वो खबर जो हमारे देश के रियल हीरोज़ से जुडी थी, पर अफ़सोस मुझे यह खबर कहीं नहीं मिली; न देश के सर्वोच्च दैनिक समाचार पत्र मैं और न राष्ट्रीय समाचार चैनलों में!
यह खबर थी १९९९ के कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों की स्मृति और सम्मान में मनाए जाने वाले विजय दिवस के बारे में; २६ जुलाई १९९९ को भारतीय सेना ने पाकिस्तान को कारगिल के मैदान-ए-जंग में क़रारी शिकस्त देकर जीत हासिल की थी|
भारतीय सेना ने इस जीत में अपने ५३५ जवान खो दिये, न जाने कितने लापता हो गए| पर अफ़सोस १३ वर्ष पूर्व हुए कारगिल युद्ध और शहीद हुए जवानों को प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माडिया में से किसी ने कोई स्थान नहीं दिया| हाँ फेसबुक पर विजय दिवस से जुड़े कुछ पोस्ट देखने को ज़रूर मिले|

पर क्या इतना काफ़ी है; उन वीर जवानों के सम्मान के लिए! जो बिना स्वार्थ के अपने प्राण देश और देशवासियों पर न्यौछावर करते है| हँसते-हँसते अपने सीने पर गोली खाते और उन्हें देश के समाचार पत्रों में ४ इंच का एक कॉलम तक नहीं मिलता| हमारे जवान मैदान-ए-जंग में किसी मान-प्रतिष्ठा या राष्ट्रपति 
द्वारा दिए जाने वाले मेडल और प्रशश्ति पत्र के लिए नहीं शहीद होता है पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम अपने जवानों के सम्मान को गिरने न दे|

हम रजतपटल पर मरते आनंद को देखकर आंसू बहाते है जबकि हमें बखूबी पता होता है कि उस मृत्यु दृश्य को सजीव बनाने के लिए अभिनेता बार बार रीटेक देता है और वह वास्तविक जीवन में जीवित भी है, लेकिन फिर भी सिनेमाघरों से निकलते वक्त हम ग़मज़दा होते है क्योंकि हमारा प्रिय अभिनेता फ़िल्म में मर गया है|
जबकि सीमा पर लड़ते मरते जवानों के पास रीटेक का वक्त ही नही होता... वह एक ही टेक में दुश्मन को मार गिराता है या उसकी गोली से हमेशा के लिए मर जाता है|  फिर भी हम उन्हें आसानी से भूल जाते है जबकि वो दोबारा ज़िंदा भी नहीं होते|
हमारी संसद या सीमा पर जो जवान मारे गए है, वो सब हमारी रक्षा करते हुए शहीद हुए है फिर भी हम उनकों बड़ी आसानी से भूला देते है और चलचित्र के अभिनेताओं को याद करते रहते है| 

हमारी निर्लज्जता की अब तो हद भी पार हो गई है| हम संसद और मुंबई जैसी आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले आतंकियों को पिछले १० सालों से जेल में बिठा कर पनीर-बिरयानी खिला रहे है| देश का यह कृत उन शहीदों के बलिदान को व्यर्थ साबित करता है| अफ़जल गुरु की फांसी की सजा विचाराधीन होना, हमारे सैनिकों के बलिदान और सम्मान पर बेहद शर्मनाक मज़ाक है| आतंकी पड़ोसी देश हमारे जवानों के शरीर से आँखें, नाखून और बाल नोंच कर हमें उनका क्षत-विक्षत शव वापस करता है और हम उसी आतंकी पड़ोसी देश की तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाने की सोच रहे है, देश और सरकार का यह कदम हमारे देशभक्त वीर जवानों की वीरता को अपमानित करने वाला कदम है| 

पर ग़लती सरकार या उस पड़ोसी देश की नहीं है| ग़लती हमारी है आम नागरिकों की; जो देश के सच्चे नायकों को अनदेखा कर आभासी नायकों के लिए आँसू बहाती है, वाहवाही करती है| अखबार और न्यूज़ चैनल भी बॉलीवुड अभिनेताओं के इतिहास-भूगोल की पूरी पूरी सही जानकारी आम जनता तक पहुँचाने में एक सक्रीय भूमिका निभाते रहते है पर इन सूचना-प्रसारण प्रमुखों के पास सीमा पर लड़ते जवानों की कोई जानकारी नहीं होती क्योंकि रियल हीरो की जिंदगी में कोई चटपटा मसाला और रोमांच नहीं होता, जिसे देखाकर ये पैसे कमा सके! सभी टीवी चैनल बॉलीवुड हिरोइनों के अंगप्रदर्शन को बड़ी प्रमुखता और चाव से दिखता है पर मैदाने-जंग में शहीद हुए जवान के घर की हालत नहीं दिखाता है| सबसे बड़ा सच तो ये है कि हम स्वयम सच्चाई नहीं देखना चाहते| अपने सैनिकों के बारे में कुछ नहीं पढ़ना चाहते और न कुछ जानना चाहते है क्योंकि उनके जीवन में कोई रोमांच नहीं है, कोई चटपटी मसालेदार कहानी नहीं है|

हम अपने घरों में एसी चला कर बड़े आराम से निर्भीक होकर सोते है, बिना किसी डर के दफ़्तर जाते है क्योंकि हमने अपने देश की सीमाओं पर लाखों वफ़ादार, निष्ठावान और बहादुर पहरेदार खड़े कर रखे है पर कभी सोचा है, सैनिकों और उनको परिवार के प्रति हमारी यह उदासीनता और लापरवाही, सैनिकों में एक दिन रोष का कारण भी बन सकती है! हमारी ऐसी कृतघ्नता देखकर अगर सैनिकों ने लड़ने से मना कर दिया और सीमा छोडकर अपने अपने घरों में वापस चले गए... तो हम कहाँ के रह जाएगें!

इसलिए सिर्फ १५ अगस्त और २६ जनवरी के अलावा भी हमें अपने देश के सैनिकों को सम्मान देना चहिये| उनके निस्वार्थ बलिदान को मान देना हमारा फ़र्ज़ होना चाहिये| हमें उनका और उनके परिवार का आभारी होना चाहिए क्योंकि उनके साहसों और वीरता की बदौलत ही हम ज़िंदा और सुरक्षित है न कि किसी बॉलीवुड हीरो की फ़िल्मी बहादुरी के चलते|

जय जवान, जय हिंद!!!

Wednesday, 13 June 2012

मंदिर के लड्डू

एक पुरुष  का प्रेम अक्सर नारी की देह पर आकर ही क्यों खत्म हो जाता है? क्या एक औरत देह से ज्यादा कुछ नहीं उसके लिए? पुरुष के हृदय में नारी के प्रति प्रेम कम और मस्तिष्क में वासना अधिक होती है| शायद यही मुख्य वजह है औरतों के साथ बलात्कार का|
अक्सर पुरुषों की शिकायत होती है कि औरतें ही उन्हें उकसाती है... कभी अश्लील और उत्तेजक कपड़ो से, कभी मुखर प्रतिक्रिया से...
पर  जब बलात्कार आठ नौ साल की लड़की के साथ होता है तो क्या वो लड़की भी अश्लील इशारे करती है एक अधेड़ आदमी को! जो नपुंशक आदमी उसका बलात्कार करते है|

वेश्यावृत्ति से घिरी औरतें समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखी जाती क्योंकि वो  औरतें एक से ज़्यादा पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाती है जबकि आदमी भूल जाता है कि उन औरतों को वैश्या बनाने में वो ही शतप्रतिशत भागीदार है| 
पुरुष, एक वैश्या से उत्पन्न अपनी ही बेटी से शारीरिक संबंध बनाता है और औरत को उसकी हद बताता है! 

जिस औरत को सुबह दिन के उजाले में वैश्या की गाली देते, उसी औरत के साथ रात में बिस्तर पर मर्द होने का दम्भ भरते!
एक औरत कभी अपनी मनमर्ज़ी से वैश्या नहीं बनती... वो पुरूष ही है जो घर में बीवी के होते बाहर मुहं काला करता है और औरत को वेश्यावृत्ति करने पर मजबूर करता है|

अभी कुछ महान आदमी बोलोगें... हम जबरदस्ती तो नहीं करते है, किसी के साथ!  पर अगर कोई औरत न माने तो उसपर तेज़ाब डाल देते है, अगवा करवा देते है और कहते है साली मान नहीं रही थी  |

अगर आदमी अपनी बीवी से प्यार करता है तो बाहर मुहं मारने क्यों जाता है? सच तो ये है कि आदमी वासना में लिप्त है उसे अपनी मर्दानगी  दिखाने के लिए १० औरतें चाहिए  |

हमेशा औरतों से ही सुचिता की उम्मीद क्यों की जाती है ? 
एक पुरुष दुनियाँ की हर औरत को भोगना चाहता है, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहता है परन्तु शादी उस लड़की से करना चाहता है जिसका कभी किसी के साथ "चक्कर" न चला हो | किसी और पुरुष ने उसका शीलहरण न किया हो |

अजीब सी दोहरी मानसिकता है पुरुष की... दारुखाने में बैठकर  दोनों हाथों में लड्डू चाहिए वो भी मंदिर के!!! 

Sunday, 10 June 2012

कैसे रिश्ते !




"अपने तो अपने होते है बाकी सब सपने होते है" 
ये बात कितनी सही है और कितनी गलत,  इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है|
मेरे घर के ठीक सामने एक तिमंजिला मकान है... जो पिछले एक सप्ताह से तोड़ा जा रहा है और लगभग आधे से ज्यादा टूट चुका है|

मकान मालिक को मैंने कभी नहीं देखा,  शायद उनकी मृत्यु  बहुत  पहले हो चुकी है और अपने पीछे वो अपनी पत्नी,  दो बेटियाँ और चार बेटे छोड़ गए और ये मकान(जो हाल में तोड़ा जा रहा है)|  मरने से पहले वो अपने सभी कर्तव्य पूरे कर चुके थे |
मकान मालिक महोदय ने अपने ज़िंदा रहते ही अपनी वसीयत बना दी थी,  जिसमें भूमितल और द्वितीय तल अपने सबसे छोटे बेटे के नाम कर दिया|  प्रथम तल बाकी बचे अपने तीन बेटों में बाँट दिया| 
और मकान मालिक की पत्नी छोटे बेटे के हिस्से में आई| बेटियों को तो अपने समाज में वैसे भी कुछ नहीं दिया जाता है,  ऊपर से ब्याहता बेटियों को तो कुछ भी नहीं,इसलिए उनकों कुछ नहीं मिला| 

छोटे बेटे ने कुछ दिनों तक अपनी माँ को साथ रक्खा और एक दिन उसने अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दिया|  वो और उसकी पत्नी एक बूढी माँ खाना नहीं दे सकते है,  रहने को एक कमरा नहीं दे सकते है और पहनने को एक सूती धोती | 
बेचारी बेबस माँ क्या करती ? बैठी रही मौत के इंतज़ार में...पर मौत नहीं आई | मौत की बज़ाय छोटी बेटी आ गई और माँ को अपने साथ लेकर चली गई|
आज वो बूढी माँ ज़िंदा है या मर गई,  मुझे नहीं पता... मैं यहाँ बेटी की प्रशंसा नहीं करना चाहती! 

बेटों ने मकान बेच दिया और कीमत आपस में बाँट ली| प्रश्न तो ये है कि एक पति ने सही किया अपनी पत्नी के साथ? जिस औरत का हाथ पकड़ कर सात फेरें लिए थे, उसके बुढ़ापे के लिए एक बोरा अनाज को अपनी वसीयत में जगह न देना सही है? जिस औरत के साथ मिलकर उसने अपने वंश को बढ़ाया,  उसको बुढ़ापे में तन ढकने के लिए दो धोतियो का पैसा नहीं देना... सही है?
जिस औरत ने पति के साथ मिलकर अपने  हाथों से घर बनाया था, क्या उसके नाम पर एक कमरा नहीं करना चाहिए था? क्या  अपनी  पत्नी  को  बेटों  के  आश्रित  छोड़ना  सही  निर्णय  है? 

औलादें तो नालायक होती है,  पर वो पति कैसे इतना निष्ठुर हो सकता है, जिसके सुख दुःख में औरत बराबर साथ देती है!

भारत में आज भी औरतें अपना अलग वज़ूद नहीं तलाशती,  वो किसी की बेटी, पत्नी और माँ बन कर ही खुश है पर सम्मान की दो रोटी की उम्मीद तो रख ही सकती है अपने पति और अपने बेटे से?
समझ पाना बहुत ही मुश्किल है कि कौन अपना है... वो पति;  जिसके सुख दुःख को अपना समझा, जिसके वंश को आगे बढ़ाया, जिसके नाम पर अपनी पूरी जवानी कर दी|
या फिर वो औलादें जिनको नौ महीने अपनी कोख में पाला, जिनका मल-मूत्र साफ़ किया,अपना खून जला कर दूध पिलाया! या फिर कोई नहीं है...

क्या औरतें! सुबह खाना बनाने वाली नौकरानी और रात में सिर्फ सोने भर की चीज़ है? 



Saturday, 9 June 2012

"डियो लगाओ और लड़की पटाओ "

आजकल कोई भी चैनल देखो टीवी पर, एक ही प्रकार के  विज्ञापन  दिखाई देता है|
"डियो  लगाओ  और  लड़की  पटाओ " 
एक डियो के विज्ञापन में- एक लड़का अपने ज़िस्म पर ऊपर से लेकर नीचे तक डियो की आधी बोतल जैसे ही स्प्रे करता है, दुनिया भर की तमाम लड़कियां उसके कमरे आ धमकती है| एक और दूसरे विज्ञापन में जैसे ही लड़का फलां कम्पनी का डियो लगाता है समुद्रतट पर खड़ी लड़कियाँ  उस पर टूट पड़ती है और विज्ञापन सांकेतिक रूप से दिखाता है कि लड़का, लड़कियों के अंत:वस्त्र खोल रहा है |
कोई भी विज्ञापन देखो, सबका एक ही मकसद है- लड़की पटाओ| इसके अलावा तो टीवी में कुछ आता ही नहीं| फलां साबुन से नहाओ, फलां शैम्पू लगाओ और लड़की को पटाओ|


ऐसे ही एक और विज्ञापन आता है टीवी के "प्राइम टाइम" पर महिलाओं के अंत:वस्त्रों का- बाज़ार में घूमती कुछ लड़कियाँ एक लड़के को देखकर आपस में बोलती है कि वो हमारे वक्ष देख रहा है ... "क्या हमारे अंत:वस्त्र ठीक नहीं है " ? 


ये क्या है ? इतने वाहियात और घटिया विज्ञापन बनाने का उद्देश्य क्या है?  उत्पादक कम्पनी अपने विज्ञापन में क्या दिखाना चाहती है? क्या आज के युवा पीड़ी के पास सेक्स के अलावा कोई और काम नहीं है करने के लिए ? क्या लड़के/लडकियां पटाना ही उनके जीवन का पहला और आख़िरी उद्देश्य है? अगर  डियो लगाने से ब्रम्हांड की सभी लड़कियाँ पट जाती है तो फिर क्यों सड़क चलते हुए लड़कियों से छींटाकशी और छेड़छाड़ होती है? क्यों लडकियां बलात्कार की शिकार हो रही है?
अरे फलां नामचीन कम्पनी का डियो लगाओ और लडकियां  डियो की गंध से आपके पीछे पीछे भागती चली आयेगी|


महिलाओं के कोई भी उत्पाद ले लो .... बॉडी लोशन से लेकर ब्रा तक या फिर लिपस्टिक से लेकर व्हिस्पर तक हर विज्ञापन में वो लड़कों को पटाती नज़र आती है और लड़के आसानी से पट भी जाते है|
अरे फलां कम्पनी का बॉडी लोशन लगाने से या किसी बड़ी प्रतिष्ठित कम्पनी की चाय पिलाने से लड़के और उनके घर वाले पट जाते हैं तो क्यों अपने देश में दहेज प्रथा अभी तक बंद नहीं हुई है?


सिर्फ नामचीन कम्पनी का डियो लगाने भर से लड़कियां नहीं पटती और न प्रतिष्ठित कम्पनी के बॉडी लोशन से लड़के !
सच तो ये है आज भी लडकियां, लड़कों के व्यक्तित्व और विचारों को प्राथमिकता देती है और लड़के, लड़कियों की शालीनता और संस्कारों को|


समय बदल गया, शताब्दी बदल गई पर आज भी नैतिक मूल्य नहीं बदले और न हीं ये बुद्धू बक्सा बदला! कल की तरह ये बुद्धू बक्सा आज भी बुद्धू ही है|










Wednesday, 6 June 2012

शुभारंभ

आखिरकार  श्री गणेश हो ही गया!
बहुत दिनों से सोच रही थी एक ब्लॉग बनाने की... आज लगभग शायद बन गया है| मुझे ज्यादा कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या कैसे करना है? फिर भी ४ दिन के सिरदर्द और मेहनत थोड़ी बहुत रंग ले आई है| बहुत सोचा इसके नाम में बारे में क्या रक्खूं? फिर अचानक  दिमाग के बत्ती जगी कि चार दिन से मूढ़ खपा रही थी मतलब कि संज्ञाशून्य हो कर अंग्रेजी के suffer में सफ़र कर रही थी, इसलिए इसका  नाम ढूढ़ निकाला शून्य से अनंत तक   एक अंजाना अनोखा सफ़र...

वैसे मैं इतना ज्यादा सोच विचार नहीं करती हूं, क्योंकि मेरे दिमाग के कीड़े का कोई राइट टाइम नहीं है कि कब वो कुलबुलाने लगे और मैं कुछ भी बेसिर पैर की पोस्ट शेयर कर दूँ| इसलिए सोचा कि अपना एक ब्लॉग बना लेते है; जब कभी दिमाग के बंदर गुलाटी मारेगें एक आध पोस्ट चिपका दूंगी और वैसे भी कभी कभी अपने दिमाग का इस्तेमाल करने में अपना क्या जाता है! अपने पास तो दिमाग का पूरा स्टॉक है, जब मन करेगा ५० ग्राम खर्च कर दूंगी आखिरकार दिलदार जो ठहरी!