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Saturday, 3 November 2012

प्रेम या बाध्यता ?


परसों मैंने "मेरा पति मेरा देवता है" शीर्षक से एक लेख लिखा था| बहुत से लोग उस लेख से सहमत नहीं हुए और  होना भी चाहिए क्योंकि सबका अपना एक दृष्टिकोण होता है, एक अलग सोच होती है| मैं उनकी सोच से सहमत हूँ कि हर चीज़ को "प्रगतिशीलता के दृष्टिकोण" से देखकर विद्रोह या बहस नहीं करनी चाहिए| अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देने के लिए हर पल "तर्क-वितर्क-कुतर्क" का सहारा लेकर दूसरों की खुशियों में आग़ नहीं लगानी चाहिए  परन्तु "ऐसा ही होता आ रहा है"  मान कर तो चुप भी नहीं रहा जा सकता| मैंने यह तो बिल्कुल भी नहीं कहा कि हमें करवाचौथ पर्व नहीं मनाना चाहिए पर किसी बाध्यता या  डर के चलते अगर हम यह व्रत रखते हैं तो उसका क्या औचित्य है?

मैंने अपने लेख में कहीं भी करवाचौथ के व्रत को "स्त्री शोषण" से नहीं जोड़ा है और मैंने न तो परसों अपने लेख में करवाचौथ के व्रत को औचित्यहीन बताया था और न आज उसकी महत्ता कम करने की कोशिश कर रही हूँ| 
बेशक़ जिन पति-पत्नी में प्रेम, स्नेह और परस्पर सौहार्द है, उन्हें पूरे हर्षोल्लास के साथ इस पर्व का आनंद लेना चाहिए क्योंकि  यह पर्व पति-पत्नी के परस्पर प्रेम, स्नेह और समझ पर निर्भर करता है|
परन्तु जब पति-पत्नी में प्रेम की तो छोड़ो परस्पर सम्मान ही नहीं है तो किस बात का करवाचौथ और उसकी पूजा? जब हमारे दिल में अपनी शादी को लेकर कोई सम्मान ही नहीं, हम अपनी शादी से खुश नहीं हैं, साथी के प्रति स्नेह और ज़वाबदेही ही नहीं है तो क्यों करना यह आडम्बर? मेरे हिसाब से कोई भी व्रत या त्यौहार दुनियाँ को दिखाने के लिए नहीं बल्कि अपने लिए होते हैं, अपनी खुशी के लिए होते हैं|

आज मैं कुछ जीवंत उदाहरण देती हूँ जो कल मैंने देखे और चाह कर भी उनका विरोध नहीं कर पाई क्योंकि जैसे ही मैंने कुछ बोलना चाहा, मुझे यह कह कर चुप करा दिया गया| सब एक स्वर में बोले तुमको इसलिए नहीं पढाया गया है कि तुम हमें ही सही और गलत समझाओ  |

१- पहला उदाहरण मैं अपनी मामी जी का देना चाहूंगी| मेरी बड़ी मामी हृदयरोगी हैं, उनका एक बार ऑपरेशन भी हो चुका है| अर्धशतक से भी ज़्यादा उन्होंने करवाचौथ का निर्जला व्रत रखा है पर पिछले कुछ सालों में वह दवाइयों पर बहुत हद तक निर्भर करने लगी हैं और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती है| इसलिए उन्होंने सुबह चाय पीकर अपनी दवाइयां खा ली और  मेरी दूसरी मामी को डायबटीज़ है, उन्होंने भी चाय पीकर अपनी दवाइयां खा ली फिर दोनों मामी पूरा दिन बिना अन्न-जल के रही और रात को पूजा करने बाद जब वो मेरी नानी अम्मा के पैर छूकर आशीर्वाद लेने आईं तो मेरी नानी ने उनसे पूछा कि दवा खाई थी, चाय पी थी? और उनके हाँ करते ही नानी ने उनको सुना दिया कि "अब तो पुरानी बहुएँ खा पीकर व्रत करती हैं तो नई बहुओं से क्या उम्मीद करना"| नानी अम्मा की बातें सुनकर मैं हतप्रद थी कि नानी अम्मा को मामियों की चिंता नहीं हैं जो बीमार हैं| उन्हें यही लग रहा था उनकी बहुओं ने उनके बेटों के लिए आधा-अधूरा व्रत रखा है | उनको लगा कि बहुओं को अपने पतियों की उम्र की चिंता नहीं बल्कि अपना स्वास्थ्य देख रहीं हैं|
मेरा मानना है कि पतियों को अपनी पत्नियों के लिए करवाचौथ का व्रत करने की कोई ज़रूरत नहीं हैं पर जब सास-ससुर ताने मारते हैं तब कम से कम पतियों को अपने माता-पिता को चुप करा देना चाहिए कि मेरी पत्नी ने दवा अपने लिए नहीं हमारे लिए ही खायी है| अगर कल उसको कुछ होता है तो सुबह उठकर रोटी कौन बनाएगा? बच्चों की देखभाल कौन करेगा? आपके पैरों में तेल कौन लगायेगा?

२- मेरे दूर के रिश्ते में एक भाभी हैं जो शादी से पहले किसी और लड़के से प्यार करती थी पर घरवालों ने जबरदस्ती उनकी शादी मेरे भाई से करवा दी| आज उनकी शादी को ११ साल हो गए हैं पर उन्हें भईया से रत्ती भर न तो प्रेम है और न वो उनका सम्मान करती हैं| यह बात सबको पता है फिर भी वो पिछले ११ सालों से करवाचौथ का व्रत करती हैं और भईया के हाथों से पानी पीकर अपना व्रत तोड़ती हैं| उनको एक ९ साल का बच्चा भी है पर आज भी वो अपने प्रेमी को नहीं भूली| आज भी उसके लिए रोती हैं|

३- तीसरा उदाहरण मेरे घर के पड़ोस में एक दीदी रहती हैं| उनकी शादी को अभी सिर्फ ३ ही साल हुए हैं पर उनके और उनके पति के बीच में ज़रा सी भी नहीं पटती| तीन सालों में तीन सौ बार लड़ाई हो चुकी है, दो बार पुलिस-कचहरी हो चुकी है| २० दिन पहले दीदी-जीजा में बहुत बुरी तरह से लड़ाई हुई थी, लग रहा था कोई न कोई तो आज मर ही जायेगा| उस दिन से लेकर आज तक दोनों की बात नहीं हो रही है, दीदी अपने मायके में हैं| और उन्होंने भी कल करवाचौथ का व्रत रखा था पर जीजा जी न तो खुद आए और न फ़ोन ही किया|

४- और अब आख़िरी उदाहरण, मेरे घर काम करने वाली महरी (बाई) का है, जो पूरे महीने सबके घरों में बर्तन माँजकर कुछ कमाती हैं और पहली तारीख को सबसे रूपये लेकर अपने घर गई थी कि करवाचौथ को अपने लिए कुछ कपड़े और बच्चों से लिए मिठाई खरीद लेगी पर उसके घर पहुँचते ही उसके शराबी निक्कमे पति  ने उसे मार-पीट की और सब पैसे छीनकर शराब पी गया पर फिर भी उसने कल करवाचौथ का व्रत रखा|
जब मैंने अपनी महरी से पूछा कि तुमने व्रत क्यों रखा है तुम्हें तो तुम्हारे पति ने कल ही मारा पीटा है| तुम्हारे हाथ और आँख में कितनी चोट आई है तो वो बोली "बीबी जी पति तो पति होता है क्या करें व्रत न करें तो? अगर कल हमारे पति को कुछ हो जायगा तो सब मुझे ससुराल से निकाल देगें, मायके वाले किसके अपने होते  हैं और बीबी जी अगर व्रत नहीं करेगें तो पाप चढ़ेगा, जीते जी तो नरक भोग रहे हैं, मरने के बाद तो कम से कम चैन से रहेगें " 

इन चारों उदाहरणों को देखकर मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरी "प्रगतिशील"   सोच कहाँ और कितनी गलत है? कि हमें करवाचौथ का त्यौहार तभी मानना चाहिए जब पति-पत्नी सच में एक-दूसरे के प्रति समर्पण भाव रखते हों| उनमें प्रेम समाज को दिखाने के लिए नहीं बल्कि अपने लिए हो| जब हम अपने पति की इज्ज़त ही नहीं करतीं हैं तो सास-ननद, जेठानी को दिखाने के लिए करवाचौथ क्यों मनाना? रोज़ अपनी पत्नी को पीट दो और करवाचौथ को देवता बन कर अपनी पूजा करा लो यह कहाँ का न्याय है? हम अपने शरीर और स्वास्थ्य से परेशान हैं पर करवाचौथ की पूजा व्रत तो करना ही है, इस प्रकार की हठधर्मिता का क्या मतलब?
जब हम अपने पति को अपना पति ही नहीं मानतीं हैं तो उसे परमेश्वर बना कर उसकी पूजा क्यों करना? क्या सिर्फ दुनियाँ को दिखाना है कि हमने जबर्दस्ती वाले पति के लिए करवाचौथ की व्रत रखा है जबकि हमारे दिल में कोई और है !!! आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी हम डरते हैं कि हमारे व्रत न रखने से हमारे पति को कुछ हो जाएगा| हम ने अगर पूजा नहीं की तो दुनियाँ क्या कहेगी? हम पर पाप चढ़ेगा, हम नर्क में जलाए जाएगें|

सच तो यह है कि हम विद्रोह करना चाहते हैं, नहीं निभाना चाहते हैं बेमतलब के रिश्ते पर हमारे ऊपर पारिवारिक और  सामाजिक दबाव इतना ज़्यादा होता है कि हम विरोध तो दूर की बात है, हम बोल तक नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं?
मेरी बीवी किसी और से प्रेम करती है, यह जानते हुए भी बहुत से आदमी चुप है, क्योंकि वो समाज और परिवार के चलते अलग नहीं हो सकते| कई औरतें रोज़ पति की मार सहती हैं फिर भी चुप हैं क्योंकि पति-पत्नी का सम्बन्ध सात जन्मों का है जिसे क़ानून तो क्या ईश्वर भी नहीं तोड़ सकता है|

मुझे यह भी पता है कि कल मुझे भी शतप्रतिशत किसी के लिए करवाचौथ का व्रत करना होगा और  मैं यही चाहूँगी कि  मैं जिस किसी के लिए भी यह व्रत करूँ वह देवता न पर देवता से कमतर भी न हो| मुझे झुककर पैर छूने पर ज़रा-सी भी आपत्ति नहीं है पर कोई मुझ पर हाथ उठाएँ, यह मैं बर्दाश्त भी नहीं कर सकती| जितनी निष्ठा के साथ मैं समर्पण और प्रेम करूं, वह भी उतनी ही निष्ठा के साथ मेरा सम्मान करे|
अगर ऐसा नहीं होता है तो सच मानिएगा कि वहाँ मेरी सिर्फ बाध्यता होगी करवाचौथ का व्रत करके स्वयं को और उसको छलने की|

इस तरह के रिश्तें निभाने से बेहतर है कि हम इन रिश्तों से बाहर आ जाएं पर यह भारत है मेरी जान !!! यहाँ रिश्तों में प्रेम से ज़्यादा बाध्यता होती है| रिश्ता कोई भी हो वह साँसों की अंतिम डोर तक नहीं टूटता और हम अपनी बाध्यता को प्रेम का चोला पहना कर विवश रहते हैं हर रिश्ता निभाने के लिए|

Thursday, 1 November 2012

मेरा पति मेरा देवता है


कल करवाचौथ पर्व है, जिसको लगभग प्रत्येक हिन्दू महिला बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाती है| निर्जला व्रत करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करती है और करवाचौथ माता से जन्म-जन्मांतर तक पति का साथ मांगती है| करवाचौथ का व्रत मुख्यत: पति-पत्नी के पारस्परिक प्रेम और स्नेह का प्रतीक है| नवविवाहित वधु हो या प्रौढ़ महिला, सब समान रूप से इस पर्व को मनाती हैं| आज करवाचौथ का रूप पारम्परिक पर्व से बहुत बदल गया है| अनेक पर्वों की तरह इस पर्व पर भी हिन्दी फिल्मों का असर बखूबी देखा जा सकता है| बाज़ारों की रौनक तो करवाचौथ के दस दिन पहले से ही बढ़ जाती है और “ब्यूटीपार्लरों” की भीड़ देखते ही बनती है| आज कुछ प्रगतिवादी आधुनिक पति भी अपनी पत्नी के लिए करवाचौथ का व्रत रखने लगे हैं| अपनी पत्नियों के लिए महँगे महँगे उपहार लाते है|


यह सब बातें तो बिल्कुल सीधी और मीठी थी पर करवाचौथ के साथ कुछेक बातें ऐसी भी हैं, जिन्हें अक्सर समाज और परिवार के लोग नकार देते हैं और मन में उठ रहे सवालों के ज़वाब में हमें रीति-रिवाज और परम्परा की दुहाई देकर चुप करा दिया जाता है|

करवाचौथ का व्रत मुख्यतः पति की लम्बी उम्र और सात जन्मों का साथ पाने के लिए किया जाता है पर यह रीति उन पत्नियों के लिए तो सही है जिनके पति गुणवान, परिश्रमी और रक्षक है| परन्तु जिन औरतों के पति स्वयं अपनी पत्नी को मारता-पीटता है, शराबी है और परस्त्रीगामी है तो वो औरतें क्यों करवाचौथ का व्रत रखती हैं? हर रोज़ अपनी पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करना, छोटी छोटी बातों में ताना मारना, सबके सामने नीचा दिखाना, ऐसे पति की लंबी उम्र की कामना करना कहाँ तक सही है? आतंकवादियों, डाकूओं और चोरों की पत्नियों के द्वारा करवाचौथ का व्रत करना कहाँ तक न्यायोचित है? बेटा न होने पर अपनी पत्नी को छोड़ कर दूसरी शादी करने वाले आदमी के लिए दो-दो औरतें करवाचौथ का व्रत करती हैं, क्या उन्हें अगले सातों जन्म ऐसा ही गिरा हुआ पति चाहिए जो बेटा न होने पर उन्हें छोड़ कर दूसरी औरत के साथ घर बसा ले? पति एक पत्नी के जीते जी दूसरी औरत से शादी कर ले पर औरत उसी नालायक पति को पाने के लिए व्रत करती रहे|गरीब औरतें दूसरों के घर बर्तन मांज कर चार पैसे इकट्ठे करती हैं और पति उनसे पैसे छीन कर दारू पी जाता है, ऐसे पति का साथ सात जन्मों तक
माँगना मूर्खता ही है|
और सबसे अजीब बात तो यह लगती है कि जब पति मर जाता है तब करवाचौथ की कोई कीमत नहीं रह जाती है| माना कि करवाचौथ का व्रत  करने से आपके पति की उम्र नहीं बढी पर यह व्रत तो पति का साथ सात जन्मों तक पाने के लिए भी तो है फिर क्यों पति के मरने पर यह व्रत मर जाता है? क्या जब तक पति जिंदा था तब तक ही देवता था या सिर्फ उसको दिखाने के लिए व्रत रखा जा रहा था| 

हमारे समाज में पति नकारा, निकम्मा या चाहें जैसा भी हो उसे देवता का दर्जा प्राप्त है| वह कुछ भी करें पत्नी को उसका अनुसरण करना चाहिए| पति चाहें कितना भी गलत क्यों न हो, उसका विरोध न करके उसके साथ देना चाहिए| यह सब बातें हम औरतों को बचपन से सिखाई जाती हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि "पति परमेश्वर" है यह बात कोई आदमी नहीं औरतें ही बताती हैं, उन औरतों में बहुत सी औरतें स्वयं पति की प्रतारणा से पीड़ित होती हैं| फिर भी पति को परमेश्वर का दर्जा दिए बैठी हैं|

मुझे कोई आपत्ति नहीं है सभी औरतों के द्वारा अपने अपने पति को परमेश्वर मानने में, बशर्ते पति में परमेश्वर वाले सभी गुण मौज़ूद हों| परमेश्वर कभी अन्याय नहीं करता, कभी आग में जलाता नहीं हैं| परमेश्वर रक्षक है, भक्षक नहीं अगर ऐसा गुण किसी औरत के पति में है तो वह शौक से अपने पति को मंदिर में बैठा कर पूजे| 




Friday, 28 September 2012

पाकिस्तान फिर सुर्ख़ियों में...!

लगता है सुर्ख़ियों में रहना पाकिस्तान की पुरानी बेशुमार आदतों में से एक पसंदीदा आदत बन गई है| अक्सर पाकिस्तान भारत में आतंकी घुसपैठ और क्रिकेट खेल जगत में सट्टेबाज़ी के लिए सुर्ख़ियों में छाया रहता है और कभी अपने शीर्षस्थ नेताओं के बड़बोलेपन तथा "सर कलम" करने जैसे फ़तवे के लिए तो कभी तख़्ता पलट कर सत्ता में आने और पूर्व मंत्रियों पर महाअभियोग लगा कर देश से निकालने जैसे कामों के लिए पाकिस्तान हमेशा ही सुर्ख़ियाँ बटोर ही लेता है| कभी अमेरिका पाकिस्तान को बिना बताए उसके ही क्षेत्र में छुपे लादेन को ढेर करके उसे चर्चा में ला देता है तो कभी आम नागरिकों की दयनीय स्थिति और उनके मौलिक अधिकारों का हनन, पूरे विश्व में चर्चा का विषय बन जाता है|
यूँ कहें जहाँ पाकिस्तान वहाँ सूर्खियां या फिर जहाँ सूर्खियाँ वहाँ पाकिस्तान! मतलब पाकिस्तान और सुर्ख़ियों का साथ चोली-दामन जैसा हो गया है|

पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान फिर से सुर्ख़ियों में हैं पर इस बार सुर्ख़ियों की वज़ह कोई  कुख़्यात मंसूबा  नहीं बल्कि "प्रेम" है| अरे हाँ... सही पढ़ा है आपने; मैंने प्रेम ही लिखा है और प्रेम भी ऐसा वैसा साधारण सा नहीं है, जिस पर कोई भी दो टके का मौलवी या पंचायत मुँह उठाकर सर कलम करने का फतवा ज़ारी कर दे| यह प्रेम जन्मा है राष्ट्रपति ज़रदारी के बेटे बिलावल और विदेश मंत्री हिना रब्बानी के बीच| बिलावल और हिना दोनों ही खानदानी राईस और रसूखदार हैं और दोनों का देश की राजनीति में अच्छा ख़ासा रूतबा और दबदबा है|
यह रिश्ता किसी को मंजूर नहीं है खासकर राष्ट्रपति ज़रदारी को तो बिल्कुल भी नहीं| वह नहीं चाहते उनका २४ वर्षीय बेटा ३५ वर्षीय हिना (दो बच्चों की माँ) से शादी करे| जहाँ एक ओर हिना के पति फिरोज़ हिना-बिलावल की प्रेम-कहानी को मात्र एक अफ़वाह बता रहे हैं वही दूसरी ओर राष्ट्रपति ज़रदारी भी हिना पर राजनीतिक और गैर राजनीतिक दबाव बना रहे हैं| अब तो इस प्रेमी-जोड़े पर मीडिया भी गिद्द की तरह नज़रे गढ़ाए बैठी है और खोद खोद कर खबरें निकाल रही है| जिससे दोनों परिवारों की पेशानी पर बल पड़ने लाज़मी हैं| 

इन दोनों का प्रेम पाकिस्तान के लिए सिरदर्दी का सबब बन सकता है| इनका प्रेम समाज और राजनीति में भारी उठ-पटक भी करने में सक्षम नज़र आ रहा है| पाकिस्तान को अभी से एक भारी बदलाव के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए| परन्तु इस प्रेम-प्रसंग को लेकर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता और साथ ही यह प्रेम-प्रसंग कुछ अंदेशाओं को जन्म भी दे रहा है| यह प्रेम-कहानी बेनाज़ीर-ज़रदारी के प्रेम के जैसी लग रहे है| जैसे बेनाज़ीर, ज़रदारी के लिए राजनीतिक महकमों में घुसने का "बोर्डिंग पास" साबित हुई थी, ठीक वैसे ही बिलावल, हिना के लिए राष्ट्रपति की गद्दी तक पहुँचने का सिर्फ ज़रिया न बन जाए|

जैसा कि दीगर है हिना एक अति महात्वाकांक्षी महिला हैं, जो राजनीति में अपना एक ऊँचा कद बनाने की जुगत में हैं और आहिस्ता आहिस्ता वो अपने मकसद में कामयाब भी हो रही हैं और इस समय हिना का नाम बिलावल के साथ जुड़ना, हिना के लिए ही पतन का कारण बन सकता है पर अगर हिना की नज़र राष्ट्रपति की गद्दी पर है तो यह रिश्ता उन्हें वहाँ तक पहुँचने में काफ़ी मददगार साबित हो सकता है| वहीं अगर बिलावल भी सिर्फ हिना की ज़िस्मानी ख़ूबसूरती पर मर मिटे हैं तो उन्हें इसका खामियाज़ा राजनीतिक और निज़ी तौर पर भुगतना पड़ सकता है| 
यदि दोनों का यह प्रेम सतही और ज़िस्मों की हदों पर महसूस किया जा रहा है या किसी राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है तो इसका हश्र चाँद मुहम्मद और फ़िज़ा जैसा ही होगा|
परन्तु यदि यह प्रेम सच्चा है और सभी सामजिक वर्जनाओं को तोड़कर अपने मुकाम तक पहुँचता है तो सच में पाकिस्तान के काले इतिहास में यह घटना सदियों तक चमकती रहेगी|

हिना का अभी अभी बयान आया है कि उनके और बिलावल के बीच कुछ नहीं हैं| हिना के इस बयान पर किसी का दबाव साफ़ साफ़ नज़र आ रहा है| अब देखना होगा कि बिलावल पर इसका क्या असर होता है क्योंकि इतनी जल्दी हिना और बिलावल मानने वाले तो नही हैं|

पाकिस्तान के इतिहास में एक जबरदस्त मोड़ आने वाला है| इस सम्बन्ध पर पाकिस्तान जो भी कदम उठाएगा वह इतिहास में दर्ज होना तो तय ही है| 
दिलचस्प होगा यह देखना कि पाकिस्तान नया इतिहास बनाता है या बेनाज़ीर-ज़रदारी का इतिहास दोहराता है|


Tuesday, 25 September 2012

शांति की खोज़ में...

भारत प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों का देश रहा है| भारत की धरती पर अनेक महात्माओं ने जन्म लिया और अपना सम्पूर्ण जीवन, जीव कल्याण में लगा दिया| प्राचीन ऋषि मुनि ईश्वर की खोज़ में दर दर भटकते रहे परन्तु उन्हें साक्षात ईश्वर के दर्शन कभी नहीं हुए| 

आज आधुनिक काल में भी भारत में बाबाओं और साधुओं की कमी नहीं हुई है| शायद अगर गिनती करने बैठेगें तो प्राचीन काल से ज़्यादा साधु और बाबा मिल जाएगें क्योंकि आज कुकुरमुत्तों के जैसे हर गली-नुक्कड़ पर ढोंगी बाबाओं की दुकानें खुल गई हैं जो आम जनता को ईश्वर तक ले जाने में बड़ी सहायक सिद्ध हो रही हैं और जनता भी  ईश्वर को पाने के लिए  इन बाबाओं और साधुओं के पीछे  पागलों की तरह भाग रही है| कई लोगों ने तो ईश्वर को छोड़ कर इन बाबाओं को पूजना शुरू कर दिया है, उनका मानना है कि जो कार्य ईश्वर करने में असमर्थ है, वह सारे काम इन बाबाओं की एक कृपादृष्टि से पल भर में चुटकी बजाते हो जाते हैं| 

इन तथाकथित बाबाओं और साधुओं का ईश्वर से "डाइरेक्ट कनेक्शन" होता है तभी तो पाँच मिनट के ध्यान से ईश्वर अपना सारा काम-धाम छोड़ कर इनके पास दौड़ा चला आता है और इनके भक्तों की अपनी सामर्थ्य अनुसार समस्याएं दूर करने में जुट जाता है| कभी कभी तो मुझे लगता है कि ईश्वर, इन पहुंचे हुए बाबाओं और साधुओं के यहाँ बंधुआ मजदूर है, तभी तो इनकी एक आवाज पर उल्टे पाँव भागता चला आता है| 

प्राचीन काल के बड़े बड़े ऋषि-मुनियों ने दर दर भटक कर जंगलों में सिर्फ घास ही छीली है शायद इसीलिये  ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं हुआ और न कभी उनको अपने दर्शन दिए| उन्होंने ईश्वर को पाने के लिए अपनी पत्नी और गृहस्थी छोड़ी पर उन्हें ईश्वर तो दूर, ईश्वर का नाखून तक न मिला और अंत में बेचारे अपनी असफ़ल यात्राओं और खोज़ का सारा चिट्ठा हमें दर्शनशास्त्र के रूप में टिका कर चले गए|

पर आज के बाबाओं और साधुओं की ईश्वर पर पकड़ बहुत अच्छी और मजबूत है, तभी तो आज के बाबाओं को ईश्वर की खोज़ में भटकना नहीं पड़ता है| वो लोग आराम से अपने एसी कमरों में बैठे रहते हैं और पाँच-छै: कमसिन बालिकाएं उनकी सेवा में हर पल तत्पर रहती हैं और बाबा  इन  कन्याओं  की  मदद  से  ईश्वर  की  खोज़ करते  रहते  हैं|

यह १८-२० साल की युवतियाँ इन वातानुकूलित आश्रमों में मानसिक शान्ति की खोज़ में आती हैं| कुछ ईश्वर की प्राप्ति के लिए तो  कुछ स्वयं को जानने के लिए इन बाबाओं के सानिध्य में रहना चाहती है| यह सभी लडकियां अपने उद्देश्य में कितना सफल होती हैं यह तो वही जान सकती हैं पर बाबा के तन की शान्ति की खोज़ में यह लड़कियां अपना पूर्ण सहयोग देती हैं| बाबा और उनके शिष्य इन चेलियों के साथ रोज़ तन की शान्ति यात्रा पर निकल जाते हैं|
और जब कुछ समय पश्चात बाबा जी को तन की शान्ति के लिए दूसरी लड़की मिल जाती हैं तो यही लडकियां बाद में रोना रोती हैं "हाय हाय मेरा बलात्कार हो गया, पिछले दो साल से स्वामी जी और उनके शिष्य मेरा यौन शोषण कर रहे थे और न जाने कितनी बार मेरा गर्भपात कराया गया है"

कभी कभी तो मुझे लगता है कि  लड़कियां खुद ही कमज़र्फ़ होती हैं, जो ढोंगी पाखंडियों से स्वामी जी स्वामी जी करते जा चिपकती है| इन लड़कियों से घर में बैठ कर ईश्वर की पूजा नही की जाती है पर मुहं उठा के चल देती है स्वामी जी के सानिध्य में, शांति की खोज में...
अभी दूध के दांत टूटे भी नहीं होगें पर पता नही इन १८-२० साल की लडकियों को कौन सी और कैसी शांति की खोज रहती हैं|
अरे जब चार गैर मर्दों के बीच अकेली रहोगी... तो बलात्कार नहीं होगा तो क्या होगा?
वो कहावत तो सुनी ही होगी "जब आग फूस साथ रखोगें तो जलेगें ही" 
अपने हिंदू धर्म में कहीं नहीं लिखा है कि औरतों और लड़कियों को किसी पुरूष को गुरू या स्वामी बनाने की आवश्यकता है| उनका गुरू, स्वामी, ईश्वर सब कुछ उनका पति ही होता है पर कौन समझाएं इन करम-जलियों को!!!
सबसे बड़ी रोचक बात तो यह है कि आज के इस तकनीकी युग में कैसे कोई इन आश्रमों में बैठ कर दर्शनशास्त्र पढ़ सकता है? १८-२० साल की उम्र में लोग सबसे ज़्यादा संसारिक होते हैं, इसी उम्र में लोग प्रेम-प्रसंगो में लिप्त होते है| अपना और परिवार का नाम रोशन करने की चाह होती है| इस उम्र में तो मानसिक शान्ति की किसी को कोई ज़रूरत ही नहीं होती है, तो फिर कैसे ये लडकियां इन आश्रमों में पहुँच जाती हैं? 

मैं यह नहीं कहती कि किसी पराये मर्द से बात मत करो या किसी से हँसों बोलो नहीं... पर चिपकने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अपने समाज में गलती चाहें स्त्री की हो या पुरुष की, उसे हमेशा स्त्रियों के सिर ही मढ़ा जाता है| स्त्रियों की शारीरिक बनावट ही ऐसी है कि लाख चाहने के बावज़ूद भी कोई गलती छुप नहीं सकती| 

इन ढोंगी पाखंडियों की सच्चाई से सभी वाकिफ़ हैं फिर भी इनकी दुकानें चलती हैं क्योंकि हम सब देख कर अंधे बने रहना चाहते हैं| किसी बाबा के आश्रम से नन्हें-मुन्हें बच्चों के शव निकलते हैं तो कोई देश-विदेश में बड़े पैमाने पर सेक्स रैकेट चला रहा है| कोई नाबालिग लड़कियों के रेप केस में १०-१२ साल की सज़ा काट चुका हैं तो कोई धर्म के नाम पर पैसा बटोर कर होटल और बार चला रहा है और तो और कुछ मंदिर की गद्दी पाने के लिए अपने ही गुरु/मित्र की हत्या करवा देते हैं| फिर भी हम कुछ नहीं कहते क्योंकि हमारे लिए धर्म से बढ़ कर कुछ है| हम सबको जीते जी और मरने के बाद स्वर्ग ही चाहिए, सिर्फ इसका फ़ायदा ये पाखंडी उठाते हैं|

इन तथाकथित बाबाओं का अगर भूतकाल देखेगें तो कोई दर्जी था तो कोई सड़क के किनारे समोसे तालता था, किसी के ऊपर बैंकों का ब्याज़ बाकी था तो कोई अपने दोस्त की हत्या की सज़ा से बचने के लिए बाबा बन बैठा है| जिसको हिन्दी ठीक से बोलनी नहीं आती वो एक ही रात में अचानक से भारतीय दर्शनशास्त्र का महान विद्वान बन जाता है| १८-२० साल की लड़कियों के साथ रास रचाने वाले ५० साल के पहुँचे हुए बाबा आम जनता से कहते हैं भोग-विलास छोड़ दो| लक्ष्मी का मोह छोड़ दो, पैसा तो हाथ का मैल है, आता है जाता है पर जब कोई आयोजक इन्हें इनकी फीस से १ रूपये कम देता है तो वहाँ कथा कहने नहीं जाते हैं| खुद तो चवन्नी चवन्नी के लिए मरे जाते है और जनता तो मोह त्याग करने को कहते हैं|

ये पाखंडी और कुछ नहीं हैं सिर्फ हमारे धर्मान्ध होने का फायदा उठाते हैं और हम इतने मुर्ख हैं कि सब जानते हुए भी इनका ही साथ देते हैं|


Saturday, 22 September 2012

लव, सेक्स और धोखा




आज आधुनिक युग में प्रेम की परिभाषा बदल गई हैं| आज प्रेम का अर्थ शारीरिक सम्बन्धों से लगाया जाता हैं और बहुत हद तक यह सही भी हैं क्योंकि आज के अधिकांश लड़के और लड़कियों ने प्रेम की परिभाषा ही बदल कर रख दी है| उनके हिसाब से “प्रेम” जैसा कुछ होता ही नहीं और अगर प्रेम है तो वह सिर्फ पैसा हैं| अधिकतर लोगों का फलसफ़ा होता हैं प्रेम के नाम पर अपना काम निकालो और चलते बनो, चाहें सामने वाले की भावनाएं कितनी भी पवित्र और निर्मल क्यों न हो, वह लोग उनकी भावनाओं से खेलने में गुरेज नहीं करते हैं| उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाले पर क्या बीतेगा जब उसे उनकी असलियत का पता चलेगा| उन्हें इस बात का भी डर नहीं होता कि सामने वाले की नज़रों में वह गिर जाएगें|

आज नर हो या नारी सब आगे बढ़ना चाहते हैं इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जाते है| कई बार तो तरक्की पाने की खातिर वह अपने नैतिक मूल्यों के साथ साथ अपने शरीर को भी दाँव पर लगा देते हैं| सुप्रीमकोर्ट की महिला वकील हो या गीतिका शर्मा और बहुत से उदाहरण हैं जिन्होंने सिर्फ तरक्की के लिए अपने शरीर का सौदा कर लिया| वही दूसरी ओर पूनम पाण्डेय, शर्लिन चोपड़ा और राखी सावंत जैसे भी लोग हैं जो सस्ती प्रसिद्धि के लिए बीच सड़क पर अपने कपड़े उतारे से परहेज नहीं करते हैं| बहुत से तो ऐसे नाम हैं जिन्हें यहाँ लेना उचित नहीं है| बहुत सी महिलाएं अपनी तृप्ति और वासना की संतुष्टि के लिए नित नए जिस्म की तलाश में रहती हैं|

फिर एक और प्रश्न उठता है कि क्या सिर्फ औरतें ही अपने ज़िस्म को नंगा करने पर तुली हैं, पुरुष नहीं ?

जॉन आब्रहीम, सलमान खां को कौन भूल सकता है? अक्षय कुमार ने एक स्टेज शो के दौरान अपनी पत्नी से अपनी जींस का बटन बंद करवाया था, यह कौन भूल सकता है? सस्ती लोकप्रियता के लिए इतने बड़े मंच पर अश्लीलता से परिपूर्ण यह कदम निंदनीय है| वासना तृप्ति के लिए पुरुष, औरतों की तुलना में ज़्यादा साथी बदलते हैं|

इतिहास उठाकर देखेगें तो पुरुषों ने ही औरतों को बाज़ार में बेचा हैं, उन्हें देवदासी, नगर वधुएँ और वैश्या बनाने में उनकी ही मुख्य भूमिका थी| आज यह कह देना कि पुराने जमाने में औरतें मज़बूरी में वैश्या बनती थी पूर्णतयाः गलत हैं| पुरुष ने अपनी वासना तृप्ति के लिए औरत को देवदासी और नगर वधुएँ बनने पर मजबूर किया और उन्हें ही समाज से बाहर निकाल दिया| अपने ज़िस्म की भूख मिटाने के लिए उसने औरत को वैश्या बनाकर सड़क पर खड़ा कर दिया और स्वयं पवित्रता का चोला ओढ़े घूम रहा है|

कोई भी औरत वैश्या नहीं बनाना चाहती है चाहें वह आदिकाल हो या आधुनिक काल, पर जब पुरुष चंद सिक्कों और अपनी वासना के लिए नपुसंकता की हद पार करने पर उतारू हो तो औरत क्या करे? वैश्या या देवदासी बनी औरतों और उनके बच्चों के लिए अपने समाज में जगह है ही कहाँ? मज़बूरन उन्हें उसी क्षेत्र में रहना पड़ता है|

प्रेम के नाम पर हमेशा ही शोषण होता हैं और यह एक कटु सत्य है कि प्रेम के नाम पर शोषण पुरुष ही करता है जिसका ख़ामियाज़ा हमेशा औरतों को ही भुगतना पड़ता है| हाल ही में चंद्रमोहन की पत्नी फ़िज़ा उर्फ अनुराधा बाली के प्यार ने कितना बवाल मचाया| यह प्रेम नहीं था यह वासना थी और एक औरत का शोषण था| जाने माने फ़िल्म अभिनेता शत्रुध्न सिन्हा के रीना रॉय से प्रेम सम्बन्ध थे परन्तु उन्होंने रीना से शादी न करके पूनम से शादी की क्योंकि रीना रॉय एक बार डांसर थी और पूनम प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखती थी| कौन इसको प्रेम का नाम देना चाहेगा? कम से कम मैं तो इसे प्रेम का नाम नहीं दे सकती| 

वह प्रेम ही क्या जो समाज के सामने स्वीकारा न जा सके| वह साथी क्या जो अपने प्रेम को कलंकित और अपमानित होने से न बचा सके| वह प्रेमिका क्या जो अपने प्रेमी पर अपना सब कुछ न्यौछावर न कर दे और वह प्रेमी, प्रेमी नहीं जो मौत से पहले अपनी प्रेमिका का साथ छोड़ दे|

शायद प्रेम में वासना का मिलन आज नहीं बल्कि आदिकाल से चला आ रहा हैं, बस आज के युवा-युवतियों ने इस वासनायुक्त प्रेम से पर्दा उठा दिया है| जो कृत्य समाज में रात के अंधेरों और पर्दे के पीछे हो रहा था, उन्होंने उसे सबके सामने उजागर कर दिया है|

पहले की तरह आज भी प्रेम है पर उनके लिए जो निभाना जानते हैं, जिन्हें सिर्फ ज़िस्म दिखता है उनके लिये नहीं| मैं यह नही कहती कि प्रेम में ज़िस्म की चाहत नहीं होती, पर सच्चे प्रेम में झूठ नही होता, शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती, वासना नहीं होती| 

हमें प्रेम से नहीं वासना से बचना चाहिए| स्त्री हो या पुरुष, सबको अपनी देह के सौदे पर मिलने वाली तरक्की से बचना चाहिए| आधुनिकता के नाम पर नंगे होने से बेहतर है कि हम पूरे कपड़े पहनकर रूढ़ीवादी बने रहे क्योंकि अपनी मेहनत और ईमानदारी से कमाई गई शोहरत और पैसा लंबे समय तक रहता हैं जबकि ज़िस्म की हदों पर कमाई गई इज्ज़त जवानी के चार दिन जैसी होती है|

Friday, 14 September 2012

हाँ हिन्दी ही हैं हमारी मातृभाषा !!!



 भाषा, दोनों लोगों के बीच संवाद स्थापित करने का एक साधारण परन्तु सशक्त माध्यम है| भाषाज्ञान के अभाव में हम न तो किसी की भावनाएँ समझ सकते है और न अपने अतंर्मन की मनोस्थिति किसी को समझा सकते हैं| भाषा ही समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाती है| किसी देश या संस्कृति की उन्नति, वहाँ की भाषा पर निर्भर करती है, भाषा जितनी समृद्धिशाली और सशक्त होगी, देश उतना ही विकसित और उन्नत होगा|

यदि हमको अपनी मातृभाषा पर अधिकार नहीं है तो हम किसी और भाषा पर अपना अधिकार स्थापित नहीं कर पाएँगे क्योंकि दूसरों पर हम तभी विजय प्राप्त कर सकते हैं जब हमें अपने आप पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो| हम चाहें कितना भी पढ़-लिख जाएँ अगर हमें अपनी मातृभाषा नहीं आती तो हम अपनों से दूर हो जाएंगें| हम कितनी ही भाषाओं के ज्ञाता क्यों न हो परन्तु चिंतन-मनन हमेशा अपनी मातृभाषा में ही करते हैं और यहाँ तक कि हम अपना रोष भी अपनी ही भाषा में प्रकट करते हैं|

भारत में लगभग ६३ भाषाएँ मान्यता प्राप्त हैं और इसके अलावा न जाने कितनी और भाषाएँ और बोलियाँ हैं जो प्रचलन में हैं| देवनागिरी लिपि के साथ हिन्दी भाषा को १४ सितम्बर १९४९ को राजभाषा घोषित किया गया था| भारत में हिन्दी मुख्यतः उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान और बिहार के कुछ हिस्सों में बोली जाती है परन्तु अन्य जगहों पर हिन्दी के साथ साथ स्थानीय भाषा भी प्रमुखता से बोली जाती है| समय के साथ हिन्दी ने स्वयं को एक नई पहचान दी है| कुछ शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं ने हिन्दी भाषा को विश्व पलट पर खड़ा करने में बहुत मदद की है|

हिन्दी भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य कुछ इस प्रकार हैं -:
  •  विश्व में लगभग ५० करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं|
  • विश्व में ८० करोड़ लोग हिन्दी समझ सकते हैं|
  • अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद हिन्दी तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है|
  • ब्रिटेन में वेल्स के बाद हिन्दी भाषा का स्थान दूसरा है|
  • फिजी, मोरिशस, गुयाना, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, टाबैगो एवं संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दी अल्पसंख्यक भाषा है|
  • दुनिया के करीब ११५ शिक्षण संस्थानों में हिन्दी का अध्ययन होता है|
  • अमेरिका के ३२ संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जाती है|
  • ब्रिटेन की लंदन यूनिवर्सिटी, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी एवं यार्क यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढाई जाती है|
  • जर्मनी के १५ शिक्षण संस्थानों ने हिन्दी भाषा के अध्ययन को अपनाया है|
इसके अलावा बहुत से विदेशी साहित्यकारों ने हिन्दी भाषा में अपनी रचनाओं को कलमबद्ध किया है| जिनमें से किम यांग शिक (दक्षिण कोरियाई साहित्यकार), विक्टोरिया सेलेना (रूसी साहित्यकार), प्रोफ़ेसर विड हान (रामचरित मानस का चीनी भाषा में अनुवाद किया है)| प्रोफ़ेसर ओडोलीन सीमीचेल ने तो बहुत सी रचनाएँ हिन्दी में लिखी हैं, जिनमें से मेरे प्रीत तेरे गीत, स्वाती बूंद, नमो नमो भारतमाता प्रमुख रचनाएँ हैं|

आज विदेशों में हिन्दी अपना परचम लहरा रही है परन्तु भारत में हिन्दी भाषा को कोई सम्मान नहीं प्राप्त है, सिवाय इसके कि वह राष्ट्रभाषा है| भारत के सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थानों का कोई कार्य हिन्दी में नहीं होता है| यहाँ लोगों को हिन्दी बोलने में शर्म आती है| हिन्दी को अनपढ़ों और गवाँरों की भाषा समझा जाता है| भारत में अंग्रेजी अघोषित राजभाषा बन गई है| हिन्दी राजभाषा के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह कि स्नातक छात्रों तक को हिन्दी की वर्णमाला नहीं आती है| सिर्फ हिन्दी भाषा एक ऐसी भाषा है जो अन्य भाषाओं के शब्दों को बड़ी आसानी से अपने स्वरुप में समाहित कर लेती है| हिन्दी एक विस्तृत और विशाल भाषा है परन्तु इसमें कुछ संशोधन की आवश्यकता है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हिन्दी से दूर भागे या हिन्दी को अपनाने में शर्म करें|

सबसे बड़ी हास्यास्पद बात तो यह है कि सुबह से लोग एक दूसरे को “Happy Hindi Day” बोलकर हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ दे रहे हैं| वही दूसरी ओर १५ अगस्त और २६ जनवरी को भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, देश को राष्ट्रीय भाषा हिन्दी में सम्बोधित न करके अंग्रेजी में अपना भाषण सुनाते हैं और निर्लज्जतापूर्वक कहते हैं कि अंग्रेजी एक समृद्धिशाली भाषा है| कुछ शीर्षस्थ नेता तो यहाँ तक कहते हैं कि हिन्दी नौकरों की भाषा है| मैं यह नहीं कहती कि अंग्रेजी अशिष्ट भाषा है परन्तु देश के प्रतिनिधियों को राजभाषा के साथ ऐसा व्यवहार करना शोभा नहीं देता है|

भारत एक हिन्दीभाषी देश है परन्तु पूरे वर्ष हिन्दी भाषा की किसी को कोई चिंता नहीं होती लेकिन सितम्बर माह के प्रारंभ होते ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थान हिन्दी पखवाड़ा मनाने में जुट जाते हैं| जगह जगह पर सम्मेलन एवं संगोष्ठियाँ प्रारंभ हो जाती हैं| हिन्दी भाषा के साथ यह होना चाहिए, वह होना चाहिए या यह नहीं होना चाहिए... कुछ इस तरह के विषयों पर शिक्षाविद एवं कवि विचार करते नज़र आते हैं परन्तु हिन्दी पखवाड़ा बीतते ही सब लोग हिन्दी का चोला उतारकर खूंटी पर टांग देते हैं और अंग्रेजियत को गले से लगा कर धूमने लगते हैं| हिन्दी भाषा की स्थिति बिल्कुल उस ब्याही बेटी की तरह हो गई है, जिसको महत्वपूर्ण अवसर पर ही मायके बुलाया जाता है और अपने देश में हिन्दी दिवस मनाना तो बिल्कुल करवाचौथ के त्यौहार के जैसा है| पूरे साल पति को “बैकफुट” रखने वाली भारतीय पतिव्रता नारियाँ अचानक करवाचौथ को अपने “बैकफुटिए पति” को परमेश्वर बनाकर पूजती हैं और अगला दिन होते ही परमेश्वर पति फिर से बेचारे पति में बदल जाता है| हम भी अपनी राजभाषा के साथ बिल्कुल ऐसा ही कर रहे हैं| साल के ३६४ दिनों में हमें हिन्दी की याद नहीं आती लेकिन हिन्दी दिवस को अचानक उसे सजा-सवाँरकर कवि सम्मेलनों और सभागारों में मुज़रा कराने के लिए बैठा देते हैं| हमें समझना चाहिए  राजभाषा आखिर राजभाषा है, हमारे सम्मान और अस्तित्व का प्रतीक हैं| मैं मानती हूँ कि हम अपनी राजभाषा हिन्दी के लिए कुछ नहीं कर सकते पर कम से कम १४ नवम्बर को Happy Hindi Day मनाकर हिन्दी को अपमानित तो न करें|